परम समर्थ अर्थ के ज्ञाता, तेरापंथ सम्राट

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साध्वी स्वर्णरेखा

परम समर्थ अर्थ के ज्ञाता, तेरापंथ सम्राट

परम समर्थ अर्थ के ज्ञाता, तेरापंथ सम्राट,
मुक्त पंख ज्यों मुक्त कल्पना, चिन्तन सत्य विराट॥
तुलसी युग की कृति आप हैं, तरुणाई सौन्दर्य छाप है,
महाप्रज्ञ का दिव्य प्रताप है, मिला पुण्य से ग्यारह का अंक, शोभित तुमसे पाट ॥ १॥
नैसर्गिक निश्चल तन-मन है, सदा गुलाब ज्यों मनभावन है,
महाशून्य में आत्मरमण है, कैसे ?
तोलूं स्वर्णिम शब्दों का नहीं गुरुवर बाट ॥ २ ॥
जीवन और प्रकृति सुंदर है, गहन गंभीर नाम मन्तर है,
अनुभव से हरपल निडर है, स्निग्ध सौम्य तेजस्वी दर्शन से रहता है ठाठ ॥ ३ ॥
गजल और गीतों में गाऊं, कविता और कहानी बनाऊं,
महाश्रमण जय ध्यान लगाऊं, तुलसी महाप्रज्ञ ने सब संतों में लिया है छांट ॥ ४ ॥
देव मिले युग-युग पथ दर्शन चलते चले, बोधि दें, अर्पण
धरती चंदा ज्यों आकर्षण, आत्मविहारी शरण तुम्हारी, चमक रहा है ललाट ॥ ५ ॥