समृद्ध धर्मगुरु, आचार्य श्री महाश्रमण

रचनाएं

मुनि कल्प कुमार

समृद्ध धर्मगुरु, आचार्य श्री महाश्रमण

धर्म अमृत है। परमवंदनीय आचार्य श्री महाश्रमण धर्मपुरुष हैं और अमृत पुरुष हैं, दयालु हैं और कृपालु हैं, आश्वस्त हैं और विश्वस्त हैं, ज्ञान मूर्ति हैं और चारित्र मूर्ति हैं। एक व्यक्ति के हाथ में लड्डू था और वह उसे देख रहा था। वह सोचने लगा कि मैं इसे किधर से खाऊँ कि मुझे अधिक मीठा लगेगा। दूसरे व्यक्ति ने मुस्कुरा कर कहा - तुम इसे कहीं से भी खाओ, इसका स्वाद मीठा ही आयेगा।
इसी तरह हम महामानव आचार्य श्री महाश्रमणजी के जीवन को देखें तो उनके व्यक्तित्व का हर पहलू आनन्द से सराबोर करने वाला मिलेगा। उनके जीवन से प्रेरणा, शान्ति और प्रकाश ही मिलता है। एक व्यक्ति गंगा के किनारे गया और बोला - गंगा माता! तेरा पानी खारा है या मीठा है? गंगा बोली - जरा चखकर के देखलो। महापुरुषों का जीवन गंगा के नीर सदृश पावन होता है। आचार्य श्री महाश्रमणजी एक महान आचार्य और अनुशास्ता हैं। चाहे हम उनके आचार को देखें, चाहे हम उनके अनुशासन को देखें और चाहे हम उनकी विचार-वीथी को देखें, तो हमें उनके जीवन-दर्शन में सादगी, सकारात्मकता और सहिष्णुता का ही साक्षात्कार होता है। वे जीवन-कला के मर्मज्ञ हैं। उनके पास अध्यात्म की संजीवनी है।
मेरी संसारपक्षीय माता श्रीमती रेशमा बेन कहती हैं - 'कल्प! तुम जब मात्र चौबीस घंटे के थे तब तुम्हें पूज्यप्रवर महाश्रमणजी के दर्शन करवाये थे।' उन्होंने मुझ पर दृष्टिपात किया, वात्सल्य की वर्षा की और देखकर आश्चर्य का अनुभव किया। पता नहीं, उन्होंने मुझ पर ऐसा क्या दृष्टिदान किया कि स्वल्प प्रेरणा से ही मेरी आत्मा जागृत हो गयी और मैं (मुनि कल्प कुमार) भिक्षु-शासन का एक सफल सिपाही बन गया।
मुनि को द्विज (द्विजन्मा) कहा जाता है। दीक्षा सचमुच पुनर्जन्म है और कल्याणकारी दिवस है। इसके प्रति आह्लाद का भाव होना स्वाभाविक है। परमाराध्य गुरुदेव श्री के दीक्षा-दिवस पर मैं परमानन्द की अनुभूति कर रहा हूँ और शतायु होने की मंगल कामना करता हूँ। मेरा प्रथम चतुर्मास श्रद्धेय मुनि श्री मदन कुमारजी के साथ सूरत में हो रहा है, इसे मैं गुरु-कृपा का सुफल मानता हूँ।