जन-जन के प्रेरणा स्रोत हैं आचार्य श्री महाश्रमणजी

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मुनि कमल कुमार

जन-जन के प्रेरणा स्रोत हैं आचार्य श्री महाश्रमणजी

महापुरुष जन्म से नहीं शुद्ध जीवन से बनते हैं, महापुरुष अवस्था से नहीं अर्हता से बनते हैं, महापुरुष वस्त्रों से नहीं पवित्र विचारों से बनते हैं, महापुरुष चेहरे से नहीं चरित्र से बनते हैं। इसे हमें तटस्थ होकर स्वीकारना होगा। आचार्य श्री महाश्रमण जी का जीवन सद्गुणों का भंडार है। साधुत्व स्वीकारते ही आप सतत अप्रमत्तता की साधना में निरंतर गतिमान बनते गए। अध्ययन, स्वाध्याय, सेवा की त्रिवेणी में गहरे गोते लगाते रहे। शैशव अवस्था में यदि व्यक्ति का दिमाग अगर साधना, अध्ययन में लग जाये तो वह एक दिन जन-जन का प्रेरणा स्रोत बन सकता है। आचार्य महाश्रमण जी के जीवन से यह प्रेरणा ले सकते हैं। मात्र बारह वर्ष की अवस्था में दीक्षा लेकर तत्त्वज्ञान, आगम ज्ञान के साथ-साथ अन्य अनेक ग्रंथों को कंठस्थ कर उसकी स्वाध्याय में रत रहे। शैशव वय की चपलता आपके इर्द-गिर्द भी नहीं फटकती। साधना के प्रति आपकी गहरी निष्ठा थी इसी का सुपरिणाम है कि आज जिन संतों के साथ दिल्ली चातुर्मास हेतु पधारे उन्होंने जब संघ मुख्य की बात कही तब आपने संघ में रहने का ही स्वनिर्णय किया। उसी का सुफल है कि हमें आज इस पाँचवें आरे में भी चौथे आरे के सिद्ध पुरुष का कुशल नेतृत्व प्राप्त हो रहा है। आपकी अंतरंग साधना को देख कर जैन-अजैन सभी नतमस्तक हैं। वर्तमान युग में इतना संयम और इतना पुरुषार्थ देखने को मिलना भी दुर्लभ है।
आचार्य श्री महाश्रमण जी तेरापंथ धर्म संघ में प्रथम आचार्य हैं जिन्होंने देश-विदेश की पैदल यात्राएं की। आचार्य महाश्रमण जी के शासनकाल में कीर्तिमानों का मानो अंबार सा लग गया है। जैसे एक साथ 43 दीक्षाएं, एक दिन में 48 कि.मि. का विहार, तपस्या की इक्कीस रंगी एक चातुर्मास में सैकड़ों मासखमण, ग्यारह सौ से अधिक वर्षीताप के पारणे, नियमित प्रवचन में हजारों की उपस्थिति - इस प्रकार अन्य अनेक कीर्तिमान बने। आपने सभा संस्थाओं के संतों को आध्यात्मिक पर्यवेक्षक बनाकर हर सभा संस्थाओं में एक आध्यात्मिक वातावरण बना दिया जिससे समन्वय व सौहार्द का वातावरण निर्मित हुआ है। सघन साधना शिविर, सुमंगल साधक-साधिका उपासक-उपासिकाओं के कारण समाज में साधना का वातावरण बना है।
उपासक-उपासिकाओं के योग से कितने क्षेत्रों की सार-संभाल हो रही है जिससे लोगों को साधना के साथ संघीय संस्कार मिल सके। पूज्य प्रवर की अनुशासन शैली अपने आप में अनुपम है। आपके द्वारा किया जा रहा अथक परिश्रम जन-जन के लिए एक प्रेरणा है। आपके 62वें जन्मोत्सव पर यह मंगल कामना करते हैं कि आप दीर्घायु और निरामय रहें जिससे युगों-युगों तक हमें आपका महनीय मार्ग दर्शन मिलता रहे और हम भी साधना के क्षेत्र में गतिमान बने रहें।