भारतीय ऋषि परम्परा के गौरव : आचार्यश्री महाश्रमण

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साध्वी योगक्षेम प्रभा

भारतीय ऋषि परम्परा के गौरव : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ के ग्यारहवें अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण भारतीय ऋषि परम्परा के गौरव पुरुष है। शांत सौम्य मुखमुद्रा, प्रसन्न नयन करुणाभरा हृदय, और आशीर्वाद बरसाता हस्त युगल हर दर्शनार्थी को प्रथम दर्शन में ही मंत्रमुग्ध कर देता है। संतता के साकार प्रतिमान आचार्य महाश्रमण समता नम्रता और तपस्वितां की त्रिवेणी हैं। उनकी वाणी में माधुर्य, सौंदर्य और गांभीर्य है। सत्य की उपासना उनका आत्मधर्म है। एक-एक शब्द को तोलकर बोलते हुए वे भाषा के दोषों का दूर से भी स्वर्श नहीं करते ।
त्रिआयामी जीवनशैली
आचार्य श्री महाश्रमण की गुण-स्तुति करते हुए महाश्रमणी साध्वीप्रमुखा कनकप्रभाजी ने लिखा है-
स्वात्मोपलब्धिरिति लक्ष्यमिदं महीयः, लक्ष्यं द्वितीयमनिशं खलु संघसेवा।
श्रीजैन शासन विकास विवर्धना च,
पुतः प्रभास्वर- महाश्रमणः पुनातु ॥
आचार्य श्री महाश्रमण के जीवन का प्रथम लक्ष्य है-आत्मोपलब्धि इसके लिए वे व्यक्तिगत साधना को प्रथम स्थान देते हैं। खाद्य- संयम, विश्य संयम स्वाध्याय, जप, ध्यान आदि उनकी साधना के अभिन्न अंग हैं। उनके जीवन का दूसरा लक्ष्य है-धर्मसंघ की सेवा। वे एक महान अनुशासित धर्मसंघ के नियंता है। उसके विकास हेतु वे अहर्निश सजग हैं। साधु-साध्वियों के निर्माण हेतु वे सतत आयासरत हैं।' योगक्षेम वर्ष निर्मान का महायज्ञ है, जहां करीब 500 से अधिक साधु-साध्वियां एवं समणी वर्ग विविध रूपों में समिधा अर्थित कर रहे हैं। उनकी जीवनशैली का तीसरा आयाम है-जैन शासन के विकास हेतु चिंतन-मंथन करते रहना । उसके संवधनि हेतु अनेक- विध उपक्रमों को आकार देना।
महान परिव्राजक
आज का युग द्रुतगामी साधनों का युग है। आद‌मी चांद पर जाने का सपना संजो रहा है। ऐसी स्थिति में जैन मुनि को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचने में बहुत समय लगता है। जहां सुबह चेन्नई से चलकर आज का आद‌मी मुंबई में करता है तो लेच दुबई में लंदन जाकर करता है, वहां जैन साधु हजार- दो हजार कि.मी. के लिए महिधनों-महिनों चलते रहता है। किंतु परिव्रजन अनुभूतियों का संग्रहालय है, जनकल्याण का देवालय है। भगवान महावीर, भगवान बुई, शंकराचार्य, भगवान स्वामीनारायण आदि ने परिव्रजन से ही अध्यात्म की लौ जलाई थी। आचार्य श्री महाप्रज्ञ के शब्दों में जो प्राणवान होता है, वही परिव्रजन करता है। आचार्य श्री महाश्रमणजी ने अपने 52 वर्षीय मुनिजीवन में 60000km से अधिक पदयात्रा करके भारतीय संस्कृति को समृड्डू किया है। मानवकल्यान की राहें प्रशस्त की है।
जन्मोत्सव एवं पाटोत्सव
आचार्य महाश्रमण का जन्म राजस्थान के सरदारशहर (चुरू जिल्ले) में वैशाख शुक्ला नवमी को हुआ। साधिक 12 वर्ष की वथ में नवमाधिशास्ता आचार्य तुलसी की अनुज्ञा से मुनिश्री सुमेरमलजी के मुखकमल से वैशाख शुक्ला चतुर्दशी को वे दीक्षित हुए। जन्मभूमि ही दीक्षाभूमि बन गई। आयु के 36वें वसंत में दशम दिवाकर आचार्य श्री महाक्षस जी ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। विसं. २०६६ वैशाख कृष्णा एकादशी को आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के आकस्मिक आचार्य बन गए। महाप्रयाण के पश्चात वे तेरापंथ के वैशाख शुक्ला दसमी उनके पदाभिषेक का पर्व बन गई । भगवान महावीर के कैवल्य कल्याणक के पवित्र दिन पहोत्सव की भी युति हो गई। आचार्य महाश्रमणजी के
65 वें जन्मदिवस एवं 17 वें पदाभिषेक दिवस पर श्रहाभरी वंदना । मन को महकाने वाले महामनस्वी का अभिनंदन। चेतन को चमकाने वाले चेतस्वी का अभिनंदना
जुका है जमीं, जुका है आसमां तेरे अभिनंदन में,
जहां को जगानेवाले महातपस्वी का अभिनंदन॥