रचनाएं
नव वर्ष के उपलक्ष में पूज्यप्रवर द्वारा कंठस्थ करने हेतु प्रेरित पंच परमेष्ठी से सम्बद्ध गीत
लय : नाथ! कैसे कर्म को फंद छुड़ायो
म्हारो अभिवादन स्वीकारो,
उपाध्यायजी! द्यो जीकारो, म्हारो अभिवादन स्वीकारो।
स्वीकारो अस्वीकारो, अभिवादन व्यर्थ न म्हारो।।
परमेष्ठी-पंचक में प्रभुवर! चोथो पद है थारी।
नमो उवज्झायाणं रो जप, लागै प्यारो प्यारो ।।
जिन-शासन रो बड़ो महकमो, साहिब! आप संभारो।
घट-घट घाली ज्ञान-रोशनी, हर अज्ञान-अंधारी।।
आगम एक अखूट खजानो, जो अध्यात्म कथा रो।
सदा भणावो शिष्य संघ नै, बाधी मधुर मथारो।।
श्रुत-उपासना संघ-शासना रो सम्बन्ध सदा रो।
उपाध्याय आचारज जोड़ी, अविचल ज्यू ध्रुव-तारो।।
पांचू अंग नमत प्रभु-चरणा, निश्चित ही निस्तारो।
तिण में 'तुलसी' बणै सहारो, थारी एक इशारो।।