गुरुवाणी/ केन्द्र
पूर्व कर्मों का क्षय करने के लिए इस शरीर को करें धारण : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, शांतिदूत युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी जैन विश्व भारती में योगक्षेम वर्ष के संदर्भ में अपनी धवल सेना के साथ विराजित हैं। लगभग 37 वर्षों पश्चात् लाडनूं की पावन धरा पर आयोजित हो रहे योगक्षेम वर्ष की पृष्ठभूमि के रूप में आज से त्रिदिवसीय अनुष्ठान का उपक्रम प्रारंभ हुआ। पूज्य प्रवर की मंगल सन्निधि में उपस्थित चारित्रात्माओं ने सर्वप्रथम सविधि वंदन किया तदुपरान्त आचार्यश्री के साथ लोगस्स आदि अनेक मंत्रों का जप हुआ।
आचार्यश्री ने समुपस्थित चारित्रात्माओं को प्रेरणा प्रदान करते हुए फरमाया कि योगक्षेम वर्ष के संदर्भ में प्रशिक्षण का कार्य संचालित होना है और इसकी जिम्मेदारियां भी निर्धारित की गई है। मुख्य मुनिश्री महावीर कुमारजी को जैन दर्शन, अणुव्रत, जीवन विज्ञान आदि के प्रशिक्षण का जिम्मा सौंपा गया है। आचार्यश्री की आज्ञा से मुख्य मुनिश्री महावीर कुमारजी ने इन विषयों के प्रशिक्षण से संबंधित रूपरेखा व योजना की अवगति दी। साध्वीप्रमुखाश्री विश्रुतविभा जी ने प्रेक्षाध्यान से संदर्भित प्रशिक्षण कार्य की जानकारी दी तथा साध्वीवर्या श्री संबुद्धयशाजी ने तत्त्व ज्ञान विषयक प्रशिक्षण कार्यक्रम योजना की प्रस्तुति दी।
महातपस्वी युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आर्हत् वांग्मय के माध्यम से पावन संबोध प्रदान करते हुए फरमाया कि जैन दर्शन में शरीर धारण करने का सर्वोत्तम कारण बताया गया है कि पूर्व कर्मों का क्षय करने के लिए इस शरीर का पोषण करना चाहिए। अर्थात् जीवन जीने का परम लक्ष्य है - मोक्ष की प्राप्ति। चारित्रात्माएं जो घर परिवार को त्याग कर संयम स्वीकार करते हैं और संयोग से विप्रमुक्त हो जाते हैं, सांसारिक संबंधों से उपरत हो जाते हैं। साधु वह है जो सांसारिक संबंधों के जाल से मुक्त हो जाता है। साधु के मालिकाना में कोई रुपया, पैसा, जमीन, बैंक-बैलेंस इत्यादि नहीं होता है। संयोगों से मुक्त और भिक्षु के रूप में साधु रहते हैं। साधु भिक्षा जीवी होता है। कर्मों से मुक्त होने और मोक्ष प्राप्त करने के लिए साधु त्याग, तप और संयम की साधना करते हैं। संक्षेप में साधु की साधना है - पांच महाव्रत, पांच समिति और तीन गुप्ति की अखंड आराधना करना।
जीवन भर के लिए बिना विश्राम लिए इन तेरह नियमों का पालन करना साधु का धर्म होता है। ईर्या, भाषा और एषणा समितियों में विशेष सावधानी रहें। चलते समय बात न करें। सावद्य भाषा नहीं बोलनी चाहिए। कटुभाषा से भी बचने का प्रयास करना चाहिए। रत्नाधिक साधु-साध्वियों के प्रति विनय का भाव रखें। शुद्ध आहार भी दाता का अभिप्राय जानकर लें। हमारी समितियां और गुप्तियां साधना की दृष्टि से बहुत आवश्यक होती है अतः सभी को अपने नियमों और आचार के प्रति जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए।
आज चतुर्दशी के संदर्भ में हाजरी के क्रम को संपादित करते हुए आचार्य प्रवर ने साधु-साध्वियों को विविध प्रेरणाएं प्रदान की। जैन दर्शन, प्रेक्षाध्यान, आदि विषयों पर साध्वियों और समणियों के प्रशिक्षण की जिम्मेदारी पूज्य प्रवर ने बहुश्रुत परिषद् की सदस्य साध्वी कनकश्री को सौंपी। मुनि कुमारश्रमणजी को संतों के व पुरूषों के प्रेक्षाध्यान और मुनि योगेशकुमारजी को तत्त्वज्ञान से संदर्भित जिम्मेदारी वहन करने हेतु कहा। सभी चारित्रात्माओं ने खड़े होकर लेखपत्र का उच्चारण किया। साध्वी स्तुतिप्रभाजी ने गीत का संगान किया। साध्वी निर्णय प्रभाजी, साध्वी शशिप्रभाजी व साध्वी रोशनप्रभाजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी।