जीवन में अनासक्ति की साधना करने का करें प्रयास : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 15 फरवरी, 2026

जीवन में अनासक्ति की साधना करने का करें प्रयास : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आर्हत् वांग्मय के माध्यम से अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि शास्त्र में आसक्ति और अनासक्ति की बात बताई गई है। शरीर है तो शरीर को टिकाने के लिए व्यक्ति को प्रवृत्ति भी करनी पड़ती है, पुरूषार्थ भी करना पड़ता है। प्रवृत्ति है और पदार्थों के साथ जुड़ाव है तो वहां ध्यातव्य है कि आसक्ति के अधिक या कम होने के हिसाब से व्यक्ति बंधन में आ जाता है। पूर्णतया अनासक्ति की स्थिति आ जाए तो वह बहुत बड़ी बात होती है।
कर्म बंधन में दो तत्त्वों का योगदान होता है - कषाय और योग। प्रकृति बंध और प्रदेश बंध का संबंध योग के साथ तथा स्थिति बंध और अनुभाग बंध का संबंध कषाय के साथ होता है। स्थिति लम्बी है और विपाक तीव्र है तो उसमें कषाय का योगदान होता है। व्यक्ति शरीर को चलाने के लिए कोई भी प्रवृत्ति करे तो उसमें अनासक्ति और ज्ञाता-दृष्टा भाव रखने का प्रयास करे। यदि ज्ञाता-दृष्टा भाव होगा तो पाप कर्म का बंधन या तो होगा ही नहीं और यदि होगा भी तो बहुत मंद होगा। अतः व्यक्ति जो भी प्रवृत्ति करे उसमें मोह, आसक्ति नहीं हो, अनासक्ति का भाव रहना चाहिए क्योंकि हमारे मन में जो राग और द्वेष का भाव है वह बंधन का एक बड़ा कारण बन सकता है। जिन प्राणियों के मन होता है उन्हीं के पाप कर्मों का बंध अधिक होता है, जिन प्राणियों के मन नहीं होता उनके ज्यादा पाप का बंध होता ही नहीं है।
दूसरा पक्ष यह भी है कि ज्यादा धर्म की साधना भी मन वाले प्राणी ही कर सकते हैं। मोक्ष में संज्ञी मनुष्य ही साधना करके जा सकते हैं। अतः मन में राग द्वेष के भाव भी खूब उभर सकते हैं और मन वाले प्राणी वीतरागता को भी प्राप्त कर सकते हैं। हम मन वाले प्राणी हैं, संज्ञी हैं अतः हमारे मन में कल्याणकारी और पवित्र संकल्प रहने चाहिए, मन में दुर्विचार नहीं आने चाहिए। यदि न चाहते हुए भी मन में दुर्विचार आ जाएं तो किसी अच्छे पाठ जैसे नवकार मंत्र, आदि का उच्चारण कर लेना चाहिए अथवा मन में यह विचार कर लेना चाहिए कि इन दुर्विचारों को मेरा समर्थन नहीं है। ऐसा करने से विशेष पाप कर्मों का बंध नहीं होगा। व्यक्ति के जीवन में दृढ़धर्मिता बनी रहे, चाहे कितनी भी कठिनाई आ जाए धर्म के प्रति आस्था कम नहीं होनी चाहिए। हम हमारे जीवन में अनासक्ति की साधना करने का प्रयास करें, यह काम्य है।
मंगल प्रवचन के उपरान्त पूज्य प्रवर ने हनुमानगढ़ टाउन में चातुर्मास संपन्न कर कई वर्षों बाद गुरु दर्शन हेतु पहुँची साध्वियों को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। नवदीक्षित साध्वी सुकृत प्रभाजी को आचार्य प्रवर ने आर्षवाणी के उच्चारण के साथ छेदोपस्थापनीय चारित्र प्रदान किया तथा नवदीक्षित समणी गीत प्रज्ञाजी को समणी जीवन के संदर्भ में प्रेरणा प्रदान की। गुरु सन्निधि में हनुमानगढ़ टाउन में चातुर्मास संपन्न कर पहुँची साध्वी सूरजप्रभाजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी और सहवर्ती साध्वियों के साथ गीत का संगान किया। जैन विश्व भारती के मंत्री सलिल लोढ़ा ने आचार्य प्रवर की सन्निधि में प्रारंभ हो रहे, चित्त समाधि शिविर के संदर्भ में जानकारी प्रदान की।