गुरुवाणी/ केन्द्र
भौतिक संपदा की अपेक्षा आध्यात्मिक संपदा है मूल्यवान : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने जैन विश्व भारती लाडनूं के सुधर्मा सभा में अपनी अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि शास्त्र में एक सूत्र दिया गया है कि थोड़े लाभ के लिए ज्यादा नुकसान नहीं उठाना चाहिए। थोड़े लाभ के कारण बहुत को छोड़ने का प्रयास करना, यह विचार मूढ़ता है। व्यक्ति को यह ध्यान देना चाहिए कि किसी कार्य में लाभ कितना है और हानि कितनी है? जिस कार्य में थोड़ा लाभ हो और नुकसान अधिक हो, उसे करने से बचना चाहिए। जैसे कोई साधु तपस्या करता है, संयम की साधना करता है। वह सोचता है कि मेरी इस तपस्या, साधना का कोई फल मिले तो मैं अगले जन्मों में चक्रवर्ती बन जाऊं, वासुदेव बन जाऊँ। इस प्रकार का निदान कर लेता है। हो सकता है कि वह किसी जन्म में वासुदेव अथवा चक्रवर्ती बन भी जाए, परन्तु यह कितनी बड़ी मूढ़ता है कि सन्यास का, तपस्या और साधना का जीवन जो मोक्ष दिलाने वाला हो सकता है उसे भौतिक लाभ के लिए खो देना, ना समझी है। वह साधु जो व्रत और शील जिनका बहुत बड़ा फल है, उस बड़ी संपदा को एक छोटी-सी भौतिक कामना के साथ तुच्छ चीज के लिए अर्थात कौड़ी में हीरे को बेचना हो गया। यह मूढ़ता हो जाती है।
इसी प्रकार व्यक्ति के जीवन में धर्म की साधना का बहुत बड़ा फल होता है, उसके सामने भौतिक चीजे ना कुछ सी होती है। अतः धर्म की साधना को नितांत मोक्ष के लिए, आध्यात्मिक उपयोग के लिए प्रयोग किया जाए तो वह बहुत लोकोत्तर फलदायी हो जाती है। जहां भौतिकता का आकर्षण हो जाता है और तपस्या-साधना को बेच दिया जाता है, यह श्रेयस्कर बात नहीं होती है। भौतिकता एक चीज है और आध्यात्मिकता अलग व विशेष बात होती है। साधु के मन में भौतिकता की आकांक्षा का विकास नहीं होना चाहिए। अध्यात्म बहुत ऊँची बात होती है। व्यक्ति के जीवन में शरीर की सुंदरता, कपड़े, आभूषण, आदि का थोड़ा महत्व हो सकता है, परन्तु अधिक मूल्य इस बात का है कि व्यक्ति में सद्गुण कितने हैं? संयम, तपस्या, आध्यात्मिक परोपकार की भावना कितनी है? जीवन में अहिंसा कितनी है? और चारित्र कैसा है? यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात होती है। अतः बाहर के आभूषण न भी हों तो जीवन में सद्गुण रूपी आभूषण होने चाहिए। पैसे के लोभ के कारण ईमानदारी को खो देना बहुत बड़े नुकसान की बात होती है। ज्यादा धनवान बनने के लिए ईमानदारी का नाश कर बेईमानी करना भी थोड़े के लिए ज्यादा नुकसान वाली बात हो जाती है। इसलिए व्यक्ति को अपने जीवन में आध्यात्मिक संपदा का विकास करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्य प्रवर की अभ्यर्थना में साध्वी स्वर्णरेखा जी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति देते हुए सहवर्ती साध्वियों के साथ गीत का संगान किया। साध्वी विनयश्रीजी की सहवर्ती साध्वीजी ने तथा समणी कुसुमप्रज्ञाजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आज आचार्य प्रवर की सन्निधि में राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष श्री जस्टिस जी.आर. मूलचंदानी उपस्थित हुए। उन्होंने पूज्य प्रवर के दर्शन कर अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्य प्रवर ने उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।