अहिंसा, संयम, तप से जीवन को भावित कर आत्मा को बनाएं अपना मित्र :आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 14 फरवरी, 2026

अहिंसा, संयम, तप से जीवन को भावित कर आत्मा को बनाएं अपना मित्र :आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अखंड परिव्राजक, शांतिदूत युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आर्हत् वाङ्‌मय के माध्यम से अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि दुनिया में मित्र भी होते हैं। एक व्यक्ति के अनेक मित्र भी हो सकते हैं और मित्रों के साथ वार्तालाप, हंसी मजाक, घूमना-फिरना आदि अनेक उपक्रम होते हैं, किन्तु वे मित्र पराए मित्र होते हैं। शास्त्रकार ने फरमाया है कि हे पुरुष! तुम ही तुम्हारे मित्र हो, फिर बाहर किस मित्र को खोजते हो? यह एक निश्चयनय की बात है और परम बात है।
मित्र दो प्रकार के हो सकते हैं - एक परम मित्र और दूसरा अपरम मित्र। दूसरे व्यक्ति जो मित्र बनाए जाते हैं वे अपरम मित्र की कोटि के है। परम मित्र कोई बन सकता है तो वह अपनी आत्मा ही बन सकती है। दूसरा कोई भी व्यक्ति परम मित्र की उच्च कोटि में नहीं आ सकता। आत्मा को मित्र बनाने के लिए गुणात्मक ‌विकास आवश्यक है हमारी आत्मा यदि मित्र बन सकती है तो वह शत्रु की भूमिका भी अदा कर सकती है। शास्त्र में कहा गया है कि सुख और दुख की कर्त्ता और विकर्ता आत्मा ही है। आत्मा मित्र भी है और आत्मा अमित्र अर्थात् शत्रु भी है। जो आत्मा दुष्प्रवृत्ति में चली गई है वह अपनी शत्रु है। जो आत्मा सुप्रवृत्ति और अच्छे भावों में संलग्न है वह आत्मा अपनी मित्र बन जाती है। अत: आत्मा को अपना मित्र बनाने के लिए सत्कार्य करना, सद्‌विचार रखना, पवित्र भाव रखना, आदि उपाय हो सकते हैं। दुष्कार्य, दुष्प्रवृत्तियां, दुर्विचार, दुराचार आदि अपनी आत्मा को अपना दुश्मन बनाने वाली होती है।
जीवन में यदि अहिंसा है तो मानना चाहिए कि आत्मा कुछ सीमा तक मित्र है। यदि जीवन में हिंसात्मक भाव और प्रवृत्तियां है तो उस सीमा में आत्मा अपनी दुश्मन बन रही है। सच्चाई, ईमानदारी, संयम, संतोष, क्षमा आदि जीवन में है तो आत्मा मित्र है और झूठ-कपट, बेईमानी, असंयम क्रोध, लोभ-लालच यदि जीवन में हैं तो वह आत्मा अपनी शत्रु है। जहां व्यक्ति अध्यात्म की ओर उन्मुख हो जाता है वहां आत्मा मित्र बन जाती है और यदि बहिमुर्खता-भौतिकता में आसक्ति है तो वहां आत्मा दुश्मन बन जाती है।
हमारी पांच इन्द्रियों के पांच विषय-शब्द, रूप, गंध, रस, और स्पर्श में जो आत्मा आसक्त है, वह आत्मा अपनी दुश्मन बन जाती है। अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह की साधना में जो आत्मा लगी हुई है वह मित्र बन जाती है। शास्त्र में जो कहा गया है कि पुरिसा! तुममेव तुमं मित्तं! यह निश्चय नय और विशुद्ध आध्यात्मिक भूमिका की बात है। परन्तु व्यवहार में दूसरे मित्र भी हो सकते हैं, परन्तु वहां भी मित्र ऐसा बनाए जो कल्याण मित्र बन सके, जो आत्मा के हित में सह‌योग कर सके। अतः दूसरों को मित्र बनाएं अथवा न बनाएं परन्तु स्वयं की आत्मा को अपना मित्र बनाने का प्रयास करना चाहिए। अपने जीवन को अहिंसा, संयम और तप से भावित करके आत्मा को अपनी मित्र बनाया जा सकता है। मंगल प्रवचन के पश्चात् मुनि जंबूकुमारजी (सरदारशहर), मुनि देवेन्द्रकुमारजी, मुनि आर्जवकुमारजी ने अपने भावों की अभिव्यक्ति दी।