अनेक चित्तों को एक में समाहित कर धर्म के प्रति रहें समर्पित : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 12 फरवरी, 2026

अनेक चित्तों को एक में समाहित कर धर्म के प्रति रहें समर्पित : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, व्यसनमुक्ति के प्रेरक, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आर्हतवाड़मय के माध्यम से अपनी अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि ‘यह पुरूष अनेक चित्तों वाला होता है।’ व्यक्ति के मन में भाव उतरते हैं। मन और भाव का गहरा संबंध बताया गया है। मन भावों का ग्राहक और भाव मन के ग्राह्य हैं। जैसे मनुष्य के पांच इंद्रियां है और पांच इंद्रियों का अपना-अपना व्यापार होता है। कान का विषय है शब्द और व्यापार है सुनना। आंख का विषय रूप और व्यापार देखना। नाक, जिह्वा और स्पर्श के भी विषय और व्यापार होते हैं। सबकी अपनी-अपनी प्रवृत्ति भी होती है। ये पांच इंद्रियां ज्ञानेद्रियां है।
पांच कर्मेन्द्रियां भी होती है जो मूलतः प्रवृत्ति के साधन है। परन्तु श्रोत्र, चक्षु ज्ञान की माध्यम बनती है, साथ ही भोग भी होता है। उपयोग चेतना की प्रवृत्ति होती है। चेतना की प्रवृत्ति ज्ञान और दर्शन है। केवल ज्ञानी और सिद्धावस्था में भी चेतना की प्रवृत्ति होती है। केवल ज्ञान प्राप्त होने के पश्चात चेतना की प्रवृत्ति के लिए इंद्रियों और शरीर की आवश्यकता नहीं रहती है। एक समय जानना और एक समय देखना ज्ञान, दर्शन की प्रवृत्ति चलती है। इन्द्रियों की प्रवृत्ति सशरीरी अवस्था में होती है। परन्तु केवल ज्ञान होने के बाद अनीन्द्रिय अवस्था हो जाती है, यद्यपि द्रव्येन्द्रियां रहती है।
सामान्य मनुष्य संज्ञी है, समूर्च्छिम मनुष्य असंज्ञी है परन्तु केवल ज्ञानी नोसंज्ञी-नोअसंज्ञी होती है। पांच इन्द्रियां के अपने-अपने विषय नियत होते हैं परन्तु मन सारे विषयों का ग्रहण करने वाला होता है। उत्तराध्ययन सूत्र में मन को भावों का ग्राहक कहा गया है। पांच इन्द्रियां वर्तमान में अपने-अपने विषय को ग्रहण करती है पर मन की विशेषता है कि अतीत में जो घटनाएं घटी, उन्हें भी मन ग्रहण कर लेता है। भविष्य में होने वाले घटनाक्रम के विषय में भी मन कल्पना कर सकता है। मन के चित्रपट पर अनेक दृश्य उभरते हैं। सुबह दिमाग में कोई एक बात आती है और शाम होते-होते कुछ और भाव बदल जाता है। एक समय व्यक्ति शांत अवस्था में होता है, दूसरे ही क्षण वह अनेक प्रकार की योजनाएं बनाने लग जाता है। भावों का बदलाव होता रहता है।
व्यक्ति को अनेक चित्तों वाला होने के साथ-साथ किसी विषय पर एक चित्तवाला भी होना चाहिए। धर्म के प्रति आस्था के विषय में व्यक्ति का एक चित्तवाला होना भी अच्छी बात हो सकती है। देव, गुरु और धर्म के प्रति आस्था, समर्पण का भाव है, इसमें व्यक्ति को एक चित्त वाला होना चाहिए। आचार्यश्री की सन्निधि में पहुंचे साध्वी प्रतिभाश्रीजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी और सहवर्ती साध्वियों के साथ गीत का संगान किया। साध्वी शशिरेखाजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। मुनि तन्मय कुमारजी ने गीत की प्रस्तुति दी। मुनि यशवंतकुमारजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।