गुरुवाणी/ केन्द्र
पाँच महाव्रतों में रहे साधु का उत्कृष्ट आचरण : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, तीर्थंकर महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में आर्हत वाङ्मय के माध्यम से पावन संबोधन प्रदान किया। उन्होंने फरमाया कि साधु का जीवन उच्च कोटि का होता है। तेरापंथ धर्मसंघ की आचार-व्यवस्था और मर्यादाओं का सम्यक् पालन करने वाला साधु ही श्रेष्ठ साधुत्व को प्राप्त कर सकता है। आचार्यश्री ने फरमाया कि साधु के लिए पाँच महाव्रत उसकी अमूल्य संपत्ति हैं—सर्वप्राणातिपात विरमण (अहिंसा), सर्वमृषावाद विरमण (सत्य), सर्व अदत्तादान विरमण (अचौर्य), सर्व मैथुन विरमण (ब्रह्मचर्य) तथा सर्व परिग्रह विरमण (अपरिग्रह)। ये पाँचों महाव्रत अत्यंत संयमयुक्त हैं। साधु को सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवों के प्रति भी अहिंसा का ध्यान रखना चाहिए। स्थावर जीवों के प्रति भी अहिंसा का पालन आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि कोई अप्रमत्त, वीतराग साधु जागरूकता से चलते हुए अनजाने में किसी सूक्ष्म जीव की हिंसा कर बैठता है, तो वह पाप का भागीदार नहीं होता; किंतु यदि प्रमाद की स्थिति में हो, तो भले ही जीव की मृत्यु न हो, पाप बंधन संभव है।
दूसरा महाव्रत सर्वमृषावाद विरमण है। साधु को किसी के हित में भी असत्य नहीं बोलना चाहिए। क्रोध, लोभ, भय अथवा हास्य की अवस्था में भी झूठ वर्जित है। तीसरा महाव्रत सर्व अदत्तादान विरमण है—साधु को छोटी से छोटी चोरी से भी बचना चाहिए और कोई वस्तु लेने से पूर्व अनुमति लेना आवश्यक है। चौथा है सर्व मैथुन विरमण संयम की साधना है तथा पाँचवा सर्व परिग्रह विरमण के अंतर्गत साधु के स्वामित्व में धन, संपत्ति, बैंक बैलेंस, भूमि, भवन आदि कुछ भी नहीं होना चाहिए। धर्मोपकरणों एवं वस्त्रों की भी सीमितता आवश्यक है। आचार्यश्री ने फरमाया कि इन पाँच महाव्रतों के साथ-साथ धर्मसंघ की मर्यादाओं का पालन अनिवार्य है—एक आचार्य की आज्ञा में रहना, समितियों और गुप्तियों का सम्यक् पालन करना तथा संघीय अनुशासन में स्थित रहना ही साधुत्व की रक्षा करता है। आचार और मर्यादाओं के अंतर्गत रहकर ही साधु का कल्याण संभव है। मंगल प्रवचन के उपरांत साध्वी बसंतप्रभाजी एवं साध्वी सुदर्शनाश्रीजी ने संयुक्त प्रस्तुति दी। साध्वी संघप्रभाजी, साध्वी प्रणवप्रभाजी तथा साध्वी जिनबालाजी ने गुरु सन्निधि में श्रद्धाभिव्यक्ति प्रस्तुत की। कार्यक्रम में आचार्यश्री ने प्रेक्षाध्यान शिविर के प्रतिभागियों को उपसंपदा भी प्रदान की।