स्वाध्याय
धर्म है उत्कृष्ट मंगल
लय-समीक्षा
चौबीसी के गीत लय की दृष्टि से सुन्दर है। उसके गीत अति श्रुति-सुखद, सुमधुर एवं सरस हैं।
इस प्रकार प्रज्ञापुरुष श्रीमद्जयाचार्य की काव्यकृति चौबीसी अध्यात्म, तत्त्वज्ञान, काव्यात्मक गुण, लय आदि अनेक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी हैं।
चौबीसी : आगम के आलोक में
प्रज्ञापुरुष श्रीमद्जयाचार्य जैन आगमों के मर्मज्ञ थे। उनके जीवन में श्रुत के बाहुल्य और श्रद्धा की गरिमा का कमनीय योग था। उनके तात्त्विक ग्रन्थों को पढ़ने से जहां उनके बाहुश्रुत्य और बौद्धिक बल का दर्शन होता है, वहीं उनके स्तुति-काव्यों को पढ़ने से उनका भक्त रूप और श्रद्धा-बल प्रकट होता है। उनके द्वारा रचित 'चौबीसी' ग्रन्थ में श्रद्धा, भक्ति, तत्त्वज्ञान, साधना-सूत्र एवं वैराग्य का संगम है। प्रस्तुत ग्रन्थ में मन की निर्मलता व निर्विकारता की पुनः-पुनः प्रेरणा दी गई है। मन की चंचलता का कारण है— विषयासक्ति। उसका निवारण होता है वैराग्य और साधना से। गीता में अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं-
चञ्चलं हि मनः कृष्णः प्रमाथि बलवद् दुम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये, वायोरिव सुदुष्करम्।।
हे कृष्ण! यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाव वाला, बड़ा ही दृढ़ और बलवान् है। इसको वश में करना वायु को रोकने की भांति दुष्कर है।
श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रतिबोध देते हैं-
असंशयं महाबाहो! मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय! वैराग्येण च गृह्यते ।।
अर्जुन! निस्सन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है, परन्तु अभ्यास और वैराग्य से उसे वश में किया जा सकता है।
ठीक इसी आशय का सूत्र पातञ्जल योग दर्शन में मिलता है– 'अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः'– अभ्यास और वैराग्य से चित्तवृत्तियों का निरोध होता है। उत्तराध्ययन सूत्र में गौतम और केशी कुमारश्रमण का संवाद प्राप्त होता है। केशी गौतम से पूछते हैं-
अयं साहसिओ भीमो, दुट्ठस्सो परिधावई।
जंसि गोयमः आरूढ़ो, कहं तेण न हीरसि?।।
यह साहसिक (बिना विचारे काम करने वाला), भयंकर, दुष्ट अश्व दौड़ रहा है। गौतम! तुम उस पर चढ़े हुए हो। वह तुम्हें उन्मार्ग में कैसे नहीं ले जाता? गौतम ने उत्तर दिया -
पघावतं निगिण्हामि, सुयरस्सीसमाहियं।
न मे गच्छइ उम्मग्ग, मग्गं च पडिवज्जई।।
मैंने इसे श्रुत की लगाम से बांध लिया है। यह जब उन्मार्ग की ओर दौड़ता है, मैं इस पर रोक लगा देता हूं, इसलिए मेरा अश्व उन्मार्ग को नहीं जाता, मार्ग में ही चलता है।
गीता के उक्त चंचल मन और उत्तराध्ययन के उक्त दुष्ट अश्व को वश में करने के लिए वैराग्य एक सशक्त उपाय है। वैराग्य का फलित है संयम। उसके अभाव में व्यक्ति का जीवन अशान्त और असमाहित हो जाता है। भौतिक पदार्थों से सुविधा मिल सकती है पर मन की शान्ति नहीं।
आध्यात्मिकता से भौतिक सुविधा प्राप्त हो या नहीं, परन्तु चित्त-समाधि प्राप्त हो जाती है। भोग के प्रति व्यक्ति के मन में आकर्षण होता है। वह भोगासेवन में प्रवृत्त होता है, उसे तात्कालिक सुख भी मिल सकता है, परन्तु उसका परिणाम दुःखद होता है। यह तथ्य चौबीसी में इस प्रकार पद्यबद्ध किया गया है-
भोग भयंकर कटुक-फल, देख्या है दुर्गति-दातार कै।
इन्द्रिय विषय विकार थी, नरकादिक रुलियो जीव रे।
किंपाक फल नीं ओपमा, रहिये दूर थी दूर सदीव रे।।
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