संबोधि

स्वाध्याय

आचार्य महाप्रज्ञ

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महावीर ने कहा-'बीअं तं न समायरे' दुबारा वैसा आचरण नहीं करे।' दुबारा भूल करने का अर्थ है-आप स्वयं में जागृत नहीं हैं। संकल्प को लेकर एक बार तोड़ देने पर मन दुर्बल हो जाता है। संकल्प के प्रति आस्था क्षीण हो जाती है। अनेक व्यक्ति संकल्प के टूट जाने पर पश्चात्ताप कर संतोष की सांस ले लेते हैं और बहुतों के मन से पश्चात्ताप का भाव भी चला जाता है। किन्तु उन्हें यह याद रखना चाहिए कि पश्चात्ताप और प्रायश्चित्त में महान् अन्तर है। पश्चात्ताप क्षणिक शुद्धि है और प्रायश्चित्त सर्वादिक। पश्चात्ताप करने वाला मनःशुद्धि नहीं करता। वह सोचता है-मैं गलत नहीं हूं, मेरे से गलती हो गई। जिसे स्वयं के गलत होने का विश्वास है, वह अपनी भूल सुधार सकता है। भूल का वास्तविक प्रतिकार है-स्वयं को जैसा है वैसा स्वीकार करना। प्रायश्चित्त कर लेने पर भी अनेक व्यक्तियों के जीवन में कोई परिवर्तन नहीं होता। इसका मूल कारण यही है कि उन्होंने अपनी यथावत् स्थिति का स्वीकरण नहीं किया। केवल भय, प्रलोभन आदि अन्य कारणों से प्रायश्चित्त किया था। प्रायश्चित्त है-स्वयं का स्पष्ट दर्शन और फिर उस दोष-पथ का अस्वीकरण। जो अपने को देखता है वह भूलों का परिमार्जन कर निश्चित ध्येय को प्राप्त कर सकता है और जो अपने को सही मानता है, कार्य में भूल देखता है वह पश्चात्ताप कर स्वयं को पवित्र समझ लेता है। प्रायश्चित्त है अंतर-शोधन। प्रायश्चित्त व्यक्ति को बदलता है, पश्चात्ताप नहीं। महावीर आंतरिक तप की बात कर रहे हैं। इसमें पश्चात्ताप से काम नहीं चलता। स्वयं को देखना और रूपान्तरित करना है। 'पुरिसा ! तुममेव तुमं मित्तं' पुरुष । तू ही अपना मित्र है। स्वयं को बदल लेने पर पुरुष अपना मित्र हो जाता है और स्वयं को न बदलने पर शत्रु। भीतर में प्रयाण करने के लिए प्रायश्चित्त का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
(२) विनय
'माणो विणयनासणो'। 'माणं मद्दवया जिणे'– अहंकार विनय का नाशक है। अहंकार को मृदु बनकर जीतो। इससे स्पष्ट प्रतिध्वनित होता है कि विनय और अहंकार में कहीं तालमेल नहीं है। दोनों की दो दिशाएं हैं। विनय अहंकार-शून्यता है। अहंकार की उपस्थिति में विनय सिर्फ औपचारिक होता है। बायजीद नामक सूफी संत के पास एक व्यक्ति आया, झुका और बोला-कुछ प्रश्न हैं। बायजीद ने कहा- 'पहले तुम झुको तो सही'। वह बोला-आप क्या कहते हैं? क्या आपने नहीं देखा, मैंने आते ही सबसे पहले झुककर आपको नमस्कार किया था? बायजीद हंसा और बोला-'मैं शरीर को झुकाने की बात नहीं कहता। मैं पूछता हूं, तुम्हारा अहंकार झुका या नहीं? उसे झुकाओ। ऐसा ही प्रसंग बुद्ध के जीवन का है। एक धनी आदमी बहुमूल्य उपहार लेकर आ रहा था। सोचा बुद्ध स्वीकार करें या नहीं, इसलिए एक सुन्दर खिला हुआ पुष्प भी साथ ले लिया। वह उसे बुद्ध के चरणों में चढ़ाने लगा तो बुद्ध ने कहा- गिरा दो इसे। उसने वह कीमती उपहार नीचे गिरा दिया। अब फूल समर्पित करने लगा, तब भी बुद्ध बोले- गिरा दो इसे। उसे भी गिरा दिया। वह अवाक् देखता रह गया। बुद्ध फिर उसी क्षण बोले। इसे भी गिरा दो। वह बोला-भगवान। अब कुछ नहीं है मेरे हाथ में। बुद्ध ने मन्द मुस्कान के साथ कहा-भले आदमी ! मैंने कब इन्हें गिराने के लिए कहा ? मेरा संकेत था, अहंकार की ओर। तू धनी है। धन का अहं जो बोल रहा था, उसे गिराने की बात है।