संस्थाएं
जैन धर्म का सबसे पुराना नाम निग्रन्थ धर्म
तेरापंथी सभा, गंगाशहर की और से आयोजित कार्यक्रम में साध्वी श्री विशदप्रज्ञा जी ने कहा कि जिन शासन का स्तंभ चार खम्भों पर निर्भर है,चार तीर्थ पर टिका हुआ है। साधु - साध्वी, श्रावक -श्राविका। जैन धर्म का सबसे पुराना नाम निग्रन्थ धर्म, श्रमण धर्म के नाम से प्रसिद्ध था। आज लोग इसे जैन धर्म के नाम से पहचानते हैं। जैन धर्म का मुख्य लक्ष्य है आत्मा को वीतरागता की दिशा में ले जाना । राग और द्वेष को कम करना । और साधु संत त्याग तपस्या के माध्यम से अपने जीवन में संयम साधना के द्वारा आत्मा के कर्मों को कम करते-करते वीतरागता कि दिशा में आगे बढ़ते हैं। जैन धर्म के अनुयायियों को श्रमोपासक के नाम से भी जाना जाता है । साधु साध्वियों को शुद्ध साधुपन की पालन के लिए पांच निश्रा ( आधार ) बताई गई है। नंबर वन राजा ,राजा की आज्ञा शासन की आज्ञा 2.गाथापति यानी श्रावक समाज के निश्रा 3.संघ की निश्रा 4.षठजीव काय, की निश्रा एवं 5.शरीर इन सब चीज के सहयोग से ही साधना की जा सकती। साधना की दृष्टि से भी चार प्रकार के साधु होते हैं। स्थविर, जिनकल्पी, प्रतिमाधारी ,अप्रमत साधु साध्वी श्री जी ने इन सब का विस्तार से विवेचन किया। साध्वी श्री ने श्रावकों की तुलना माता पिता, भाई, मित्र से करते हुए अनेक उदाहरणों से बताया कि किस प्रकार जागरूक श्रावक अपना दायित्व निभाता है।