गुरुवाणी/ केन्द्र
योगक्षेम वर्ष में 32 आगम के स्वाध्याय का लक्ष्य रहे :आचार्यश्री महाश्रमण
लाडनूं की पुण्य धरा पर आयोजित होने वाले योगक्षेम वर्ष की पृष्ठभूमि के रूप में त्रिदिवसीय अनुष्ठान गतिमान है। इस अनुष्ठान के द्वितीय दिवस जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, तीर्थंकर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने चतुर्विध धर्मसंघ के साथ जप अनुष्ठान का प्रयोग करवाया। तत्पश्चात् आर्हत् वांग्मय के माध्यम से महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपनी पावन देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ की परंपरा में 32 आगम सम्मत हें, जिनमें 11 अंग, 12 उपांग, 4 मूल, 4 छेद और 1 आवश्यक हैं। ये बत्तीस आगम हमारे यहां प्रमाण के रूप में मान्य किए गए हैं। ग्यारह अंग तो स्वतः प्रमाण है, इसके साथ ही अन्य आगम भी हमारे लिए प्रमाण भूत शास्त्र हैं।
इस आगम बत्तीसी का साधु-साध्वियां, समणियां स्वाध्याय करते हैं, परायण करते हैं। हमारे यहां सभी बत्तीस आगमों का मूल पाठ उपलब्ध है, प्रकाशित है। इनमें से कई आगम सानुवाद और सटिप्पण प्रकाशित हो चुके हैं। कोई केवल मूल पाठ ही स्वाधीत करना चाहे तो वह भी एक स्वाध्याय का तरीका हो सकता है और मूल पाठ को पढ़ने से ही प्रायः प्रायः अर्थ समझ में आ जाए तो यह भी एक अच्छी गति है। यद्यपि अनुवाद भी महत्त्वपूर्ण है। और भी अच्छा विकास यह हो सकता है कि मूल पाठ को पढ़कर अनुवाद की त्रुटि को भी पकड़ लिया जाए।
परम पूज्य गुरुदेव तुलसी के समय आगम संपादन का कार्य प्रारंभ हुआ। गुरुदेव तुलसी की यह दृष्टि रही कि आगम का अनुवाद निष्पक्षता के साथ होना चाहिए। यदि तटस्थता पूर्ण अनुवाद होता है, वह बहुत अच्छा होता है। आगम संपादन के कार्य में आचार्यश्री महाप्रज्ञजी जुड़े और वे तो मानो आगम कार्य के प्रति समर्पित हो गए। योगक्षेम वर्ष का समय सामने हैं। साधु-साध्वियों और समणियों के न्यारा में रहने पर गोचरी, क्षेत्र संभाल आदि अनेक कार्य होते हैं परन्तु यहां अन्य कार्यों में समय लगाने की अपेक्षा नहीं है तो इस लम्बे समय का उपयोग आगम स्वाध्याय के रूप में किया जाना चाहिए।
इन बारह महीनों के समय में यदि कई आगम स्वाधीत हो जाएं तो बहुत अच्छी बात हो सकती है, साथ में कुछ नोट्स भी बना लिए जाएं तो व्याख्यान आदि की भी अच्छी सामग्री तैयार हो सकती है। इस प्रकार योगक्षेम वर्ष के समय का अपने-अपने ढंग से अच्छा उपयोग करना चाहिए। आगम के अतिरिक्त अन्य साहित्य का काम भी किया जा सकता है। गुरुदेव तुलसी के समय शुरु हुए आगम संपादन का कार्य भी यदि कुछ वर्षों में पूर्णता को प्राप्त हो जाए तो यह कितनी बड़ी बात हो सकती है। अनेक साधु-साध्वियों और समणियों को जो अलग-अलग कार्य सौंपे हुए हैं, योगक्षेम वर्ष की अवधि में उन कार्यों को पूर्ण करने का प्रयास किया जा सकता है। इसी प्रकार जो साधु-साध्वियां, समणियां उच्च अध्ययन और पी.एच.डी. आदि करें तो उनके लिए भी यह योगक्षेम वर्ष स्वर्णिम काल के समान हो सकता है। जैन विश्व भारती और ग्रन्थागार आदि के रूप में सारी सामग्रियां उपलब्ध हो सकती है।
विश्वविद्यालय से संबंधित अध्ययन और महाप्रज्ञ श्रुताराधना आदि के पाठ्यक्रमों में भी समय लगाकर ज्ञान के क्षेत्र में अच्छा विकास किया जा सकता है। उसमें भी मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित होना और सामूहिक रूप में कोई चर्चा और ज्ञान की बात हो तो बहुत अच्छी बात हो सकती है। इस प्रकार यह योगक्षेम वर्ष हमारे स्वयं के विकास का एक महत्त्वपूर्ण अवसर बन सकता है। आचार्यश्री की अनुज्ञा से नवदीक्षित साध्वी व समणी ने संत वृंद को वंदन किया तो संत वृंद की ओर से मुनि धर्मरूचिजी ने नवदीक्षित साध्वीजी और समणीजी के प्रति मंगलकामना की। तदुपरांत बहिर्विहार से गुरु सन्निधि में पहुँची साध्वी वृंद और समणी वृंद ने आचार्य प्रवर, मुख्य मुनिश्री और संत वृंद से खमत खामणा करते हुए सुख पृच्छा की तो संत वृंद की ओर से मुनि धर्मरूचिजी ने साध्वी वृंद और समणी वृंद से खमत खामणा व मंगलकामना की। मुनि कौशल कुमारजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति देते हुए गीत का संगान किया। मुनि विनोद कुमारजी ने भी अपनी श्रद्धा की अभिव्यक्ति दी।