प्रकृति को महत्ता दें, आकृति को नहीं : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 03 मार्च, 2026

प्रकृति को महत्ता दें, आकृति को नहीं : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में कार्यक्रम का शुभारंभ आचार्य प्रवर के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ हुआ। साध्वी वृंद ने प्रज्ञागीत का संगान किया। युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि व्यक्ति समाज में सामूहिक जीवन जीता है वहां संगति का भी एक विषय बन जाता है कि व्यक्ति किसकी संगति में ज्यादा रहता है। दुनिया में मित्र बनाए जाते हैं और फिर उनसे संपर्क का क्रम भी रहता है। शास्त्राकार ने एक दिशा निर्देश देते हुए सावधान किया है कि संगति, संसर्ग क्षुद्रों की मत करो। जिनकी प्रकृति क्षुद्र है, आदतें अच्छी नहीं है, जीवन में उच्चता नहीं है, संस्कार अच्छे नहीं है, भाषा का प्रयोग भी जिनका अच्छा नहीं है, धर्म, अहिंसा, अध्यात्म, आदि का जीवन में प्रभाव नहीं है, उनकी संगति करना अच्छा नहीं होता। एक व्यक्ति प्रकृति से अच्छा हो सकता है, तो दूसरा व्यक्ति प्रकृति से नीचा हो सकता है।
आकृति और प्रकृति इन दोनों का महत्त्वांकन करें तो आकृति के आधार पर, कोई विश्लेषण किया जा सकता है। किसी व्यक्ति का चेहरा अच्छा है परन्तु यदि उसकी प्रकृति क्षुद्र है तो उसकी आकृति का कोई महत्त्व नहीं है। व्यक्ति प्रकृति से ही बड़ा और प्रकृति से ही छोटा होता है, आकृति से कोई व्यक्ति नीच नहीं बन जाता और न ही आकृति से कोई महान बनता है। जिस व्यक्ति में नम्रता है, अहंकार नहीं है, क्षमा करने वाला है और आराध्य के प्रति भक्तिभाव रखता है व सबके प्रति आदर भाव है वह बड़े स्वभाव वाला व्यक्ति ही बड़ा होता है। अतः व्यक्ति को अपनी प्रकृति पर ध्यान देना चाहिए।
व्यक्ति यदि किसी अच्छे ज्ञान वाले की संगति करे तो अच्छा ज्ञान मिल सकता है। संगति तीन प्रकार की होती है - मनुष्यों की संगति, साहित्य की संगति और मीडिया की संगति। व्यक्ति को अच्छे मनुष्यों की संगति में रहना चाहिए। ज्ञानी, संस्कारी और अनुभवी व्यक्तियों के पास रहें तो कुछ अच्छा मिलने की संभावना बन सकती है। दूसरे प्रकार की संगति है - साहित्य संगति। अच्छी किताबें पढ़ने से भीतर की चेतना में अच्छे संस्कार आ सकते हैं। हिंसात्मक और खराब साहित्य पढ़ने से हमारे संस्कारों पर भी दुष्प्रभाव पड़ सकता है।
तीसरा प्रकार है - मीडिया संगति। टी.वी., मोबाइल, इत्यादि में कोई खराब चीजें देखें तो संस्कार भी दूषित हो सकते हैं। इसके विपरित यदि कोई संतों के प्रवचन, ज्ञान की वाणी आदि सुनते हैं तो अच्छी जानकारी व संस्कार मिल सकते हैं। अतः इन तीनों की संगति करने से पूर्व यह चिंतन कर लेना चाहिए कि मनुष्य अच्छे प्रकृति के हों, क्षुद्रता के नहीं हो। साहित्य उच्च स्तर का हो और मीडिया में ऐसी चीजें देखने से बचना चाहिए जो अपने लायक नहीं हो। प्रवचन की समाप्ति के पश्चात् पूज्य प्रवर ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को समाहित किया।