गुरुवाणी/ केन्द्र
मनोरंजन को छोड़ आत्मरंजन करने का प्रयास करें : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने होली पर्व के संदर्भ में ‘मनोरंजन पर आत्मरंजन’ विषय पर अपनी पावन देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि व्यक्ति मनोरंजन में भी रूचि लेता है इसलिए हास्य, विनोद, विभिन्न दृश्यों को देखना, विभिन्न शब्दों का प्रयोग करना आदि दुनिया में होते हैं। पांचों विषयों को सेवन करना व्यक्ति के भीतर की सुखाकांक्षा का भी द्योतक हो सकता है। व्यक्ति सुख चाहता है। सुख दो प्रकार का हो सकता है एक वैषयिक सुख और एक आध्यात्मिक सुख। दोनों ही सुख हैं परन्तु दोनों ही सुखों में प्रकृतिगत, स्वरूपगत अंतर होता है। वैषयिक सुख, सुख तो एक दृष्टि से हो सकता है परन्तु यदि वह आसक्ति के साथ भोगा जा रहा है तो वह दुःखों को भी साथ लेकर आ रहा होता है। व्यक्ति जन्म लेता है, जीवन जीता है और एक दिन अवसान को प्राप्त हो जाता है। जिस प्रकार व्यक्ति जन्म के साथ मृत्यु को भी साथ लेकर आता है उसी प्रकार वैषयिक सुख यदि आसक्ति के साथ भुक्त हो रहे हैं तो वे दुःख को साथ लेकर आते हैं। परन्तु जैसे-जैसे व्यक्ति साधना के पथ पर बढ़ता है, उत्तम तत्त्व को प्राप्त होता जाता है वैसे वैसे वैषयिक सुख रूचिकर नहीं लगते और जैसे-जैसे विरक्ति बढ़ती है वैसे-वैसे व्यक्ति उत्तम तत्त्व को प्राप्त कर सकता है। जब आत्मा से लगाव, त्याग की ओर आकर्षण और संयम का रसास्वादन होता है, व्यक्ति विषय भोगों से विरक्ति का अनुभव कर सकता है।
मनोरंजन पर आत्मरंजन का अंकुश होना चाहिए। संसार में लोग मनोरंजन, विभिन्न माध्यमों जैसे खाना-पीना, आमोद प्रमोद आदि से करते हैं, पर इससे भी ऊपर है आत्मा में रमण करना। जब व्यक्ति को यह अनुभूति हो जाती है कि ये बाह्य सुख किंपाक फल के समान है तो वह आत्मरंजन की ओर बढ़ सकता है और आत्मरमण और विषय विरक्ति से मिलने वाला सुख बहुत अच्छा और पवित्र होता है। आगम में सुख को परिभाषित करते हुए कहा है कि कर्म निर्जीर्ण होने से जो मिलता है वह वास्तविक सुख है। मोक्ष में जो सुख है वह एकांत सुख है और विषय भोगों का सुख अनेकांत सुख है। मोहनीय कर्म के क्षीण होने के बाद जो सुख प्राप्त होता है वह अक्षय सुख है। अतः संसार में, गृहस्थ जीवन में बाह्य मनोरंजन भी हो सकता है परन्तु साधक अथवा गृहस्थ यह सोचे कि हमारा लक्ष्य आत्मिक सुख प्राप्त करने का होना चाहिए। यदि हमारा चिंतन प्रशस्त हो जाए तो हम मानसिक दुःख से मुक्त भी हो सकते हैं। यदि कोई समस्या जीवन में आ भी जाए तो दिमाग में अधिक तनाव नहीं रखना चाहिए। चिंता का भार न ढोकर समाधान का चिंतन करना चाहिए। अतः जो अनुकूलता-प्रतिकूलता आ जाए तो उसमें समता व संतोष रखना चाहिए। बाह्य सुखों में लिप्तता सुखों का कारण बन सकती है अतः व्यक्ति को मनोरंजन पर आत्मरंजन का अंकुश रखना चाहिए। आज चतुर्दशी के संदर्भ में परम पूज्य आचार्य प्रवर द्वारा चारित्रात्माओं को विभिन्न प्रेरणाएं प्रदान करते हुए हाजरी के क्रम को संपादित किया गया। समस्त चारित्रात्माओ ने लेख पत्र का उच्चारण किया। शासन माता साध्वीश्री कनकप्रभाजी की चतुर्थ पुण्य तिथि के संदर्भ में शासनमाता के संसार पक्षीय पौत्र और योगक्षेम वर्ष प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष प्रमोद बैद ने अपनी भावांजलि दी। नरपत दूगड़ ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। मुनिश्री श्रेयांश कुमारजी, मुनि कमलकुमारजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। मुनिश्री दिनेशकुमारजी ने एक पद्य के माध्यम से शासनमाता की भाव स्मृति की।