सहन करो, सफल बनो : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 28 फरवरी, 2026

सहन करो, सफल बनो : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के अधिशास्ता, आचार्यश्री महाश्रमणजी द्वारा दिए गए प्रवचन  का मुख्य केंद्र 'सहन करो, सफल बनो' का सिद्धांत रहा। आचार्यश्री ने रेखांकित किया कि मानवीय सामुदायिक जीवन की शांति और विकास के लिए शासन प्रणाली और अनुशासन अनिवार्य हैं। दस्तावेज़ में शासन के विभिन्न अंगों (विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका) की भूमिका, धार्मिक संगठनों में मर्यादाओं का महत्व और व्यक्तिगत सफलता के लिए अनुशासन को स्वीकार करने की आवश्यकता पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है।
1. सामुदायिक जीवन में शासन प्रणाली की अनिवार्यता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने फरमाया कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और जहां भी सामुदायिक जीवन होता है, वहां एक सुव्यवस्थित शासन प्रणाली की आवश्यकता स्वतः उत्पन्न हो जाती है। व्यवस्था और नेतृत्व : विश्व के प्रत्येक स्तर (देश, राष्ट्र, प्रांत या नगर) पर शासन प्रणाली का होना आवश्यक है। चाहे वह राजतंत्र हो (जहाँ राजा प्रधान होता है) या लोकतंत्र (जहाँ प्रधानमंत्री और मंत्री होते हैं), एक मुखिया का होना अनिवार्य है। मौलिक आवश्यकताओं की सुरक्षा : शासन प्रणाली का प्राथमिक उद्देश्य व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं जैसे भोजन और आवास की सुरक्षा करना है। यदि कोई व्यवस्था न हो, तो अराजकता फैल सकती है जहाँ शक्तिशाली लोग दूसरों के संसाधन छीन सकते हैं।
शांति और न्याय: अपराधों को रोकने, अपराधियों को दंडित करने और समाज के निर्धन एवं जरूरतमंद वर्गों की सहायता सुनिश्चित करने के लिए शासन तंत्र आवश्यक है।
2. शासन के प्रमुख अंग और उनके उत्तरदायित्व एक सुचारू शासन तंत्र के तीन प्रमुख स्तंभों का वर्णन किया गया है, जो समाज के विकास और सुख-शांति के लिए उत्तरदायी हैं: अंग भूमिका और उत्तरदायित्व विधायिका : नियम, कायदे और कानूनों का निर्माण करना।
कार्यपालिका : शासन-प्रशासन की देखरेख करना और यह सुनिश्चित करना कि कार्य नियमों के अनुसार हों।
न्यायपालिका : अपराधियों को दंडित करना ताकि उनमें सुधार आए और समाज के अन्य लोग अपराध करने से बचें।
मुख्य निष्कर्ष : विधान (संविधान) श्रेष्ठ होना चाहिए और समय की आवश्यकतानुसार उसमें संशोधन या परिवर्तन की गुंजाइश होनी चाहिए। यदि विधान और उसका पालन दोनों उत्कृष्ट हों, तो संगठन या राष्ट्र का विकास सुनिश्चित है।
3. धार्मिक संगठनों में अनुशासन और विधान आचार्यश्री ने स्पष्ट किया कि शासन और अनुशासन केवल राजनीतिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि धार्मिक संगठनों के सफल संचालन के लिए भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। 
तेरापंथ धर्मसंघ की विरासत: जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के प्रथम अनुशास्ता, आचार्य श्री भिक्षु ने संघ की मर्यादाओं के लिए ठोस नियम और व्यवस्थाएं बनाई थीं।
प्रमुख नियमावली : धर्मसंघ के सुचारू संचालन के लिए निम्नलिखित विधान उपलब्ध हैं:
अनुशासन संहिता और मर्यादावली: साधु-साध्वियों के लिए निर्धारित नियम।
श्रावक संदेशिका : गृहस्थ अनुयायियों (श्रावकों) के लिए मार्गदर्शक निर्देश।
निरंतर अध्ययन का महत्व: नियमों की जानकारी के अभाव में होने वाली गलतियों से बचने के लिए साधु-साध्वियों और श्रावकों को समय-समय पर इन नियमावलियों का अध्ययन करते रहना चाहिए।
4. 'सहन करो, सफल बनो': अनुशासन का व्यावहारिक दर्शन
प्रवचन का सबसे महत्वपूर्ण विषय 'कैसे सहें अनुशासन' था। आचार्यश्री ने इस बात पर जोर दिया कि अनुशासन को केवल मानना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे धैर्यपूर्वक सहन करना ही सफलता की कुंजी है।
सफलता का सूत्र : 'सहन करो- सफल बनो' का मंत्र यह दर्शाता है कि अनुशासन के पालन में आने वाली कठिनाइयों को सहन करने से ही व्यक्ति और संगठन दोनों की प्रगति होती है।
अनुशासन की स्वीकार्यता : शासन की समस्त व्यवस्थाएं सुचारू रूप से चलती रहें, इसके लिए प्रत्येक सदस्य को अनुशासन के प्रति समर्पित रहना चाहिए।
संवाद और जिज्ञासा : अनुशासन केवल आदेशों का पालन नहीं है; इसमें जिज्ञासाओं का समाधान भी शामिल है, जैसा कि आचार्यश्री ने प्रवचन के बाद साधु-साध्वियों की जिज्ञासाओं को शांत कर प्रदर्शित किया।
5. उपासक सेमिनार और संगठनात्मक गतिविधियाँ
उपासक श्रेणी : जैन श्वेतांबर तेरापंथी महासभा के अंतर्गत आयोजित इस सेमिनार में राष्ट्रीय संयोजक सूर्यप्रकाश श्यामसुखा और जयंतीलाल सुराणा ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।
सामूहिक प्रस्तुति : उपासक श्रेणी के सदस्यों द्वारा समूह गीत की प्रस्तुति दी गई, जिसे आचार्यश्री ने अपना मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।