गुरुवाणी/ केन्द्र
धर्म का मूल है विनय : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। इसके पश्चात् साध्वी वृंद ने प्रज्ञागीत का संगान किया। महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘क्यों करें विनय’? क्यों कि प्रत्येक कार्य करने के पीछे एक प्रयोजन होता है। यदि विनय के बारे में बात करें तो विनय, अहंकार पर चोट पहुंचाने का एक उपाय है। विनय का विरोधी तत्त्व अहंकार है। अतः विनय, मान कषाय को नष्ट करने, कृष करने का एक उपाय है। अहंकार का अभाव और साथ में नम्रता का प्रयोग विनय है।
कहा गया है कि निर्बाध और अखण्ड सुख पाना है तो मोक्ष को पाना आवश्यक है। चारित्र के पालन से मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। दर्शन और श्रद्धा अच्छी होने पर चारित्र का पालन हो सकेगा। दर्शन की प्राप्ति ज्ञान प्राप्त करने से हो सकती है और ज्ञान विनय से प्राप्त होता है। अतः विनय से ज्ञान, ज्ञान से दर्शन, दर्शन से चारित्र और चारित्र से मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है। मोक्ष मिल जाने पर निरबाध सुख की प्राप्ति हो सकेगी। अतः विनय को शाश्वत सुख की आधारशिला के रूप में देखा जा सकता है। धर्म का मूल विनय को बताया गया है। अहंकार शून्यता और साथ में विनम्रता आ जाए तो यह विनय होता है।
संस्कृत के एक श्लोक में कहा गया कि जो अभिवादनशील है, हमेशा वृद्धों की सेवा करने वाला और निकट रहने वाला व्यक्ति है, उसके चार बातों का विकास होता है - आयुष्य लंबा होता है, विद्या बढ़ती है, यश फैलता है और शक्ति बढ़ती है। विनय नम्रता का प्रयोग है और अभिवादन करने से भी नम्रता झलकती है। मार्ग में बड़े संत मिले, कोई बड़ा मिले तो उसे यथा विधि वंदन अथवा अभिवादन करके उनके प्रति विनय का भाव अभिव्यक्त करने का प्रयास करना चाहिए।
व्यक्ति का व्यवहार प्रामाणिक होना चाहिए। सही बात बताने में कोई संकोच अथवा भय नहीं रखना चाहिए। दंड अथवा उलाहने से बचने के लिए प्रामाणिकता में कमी आ जाना अच्छी बात नहीं होती है। अनाचार का भी सेवन यदि हो जाए तो उसे छिपाना नहीं चाहिए। प्रामाणिकता का पथ सीधा सपाट होता है। अपनी भूल को छिपाने से तनाव पैदा हो सकता है। चारित्रात्माओं को प्रामाणिकता के प्रति विशेष जागरूक रहना चाहिए, यह हमारी आत्मा के लिए हितकर है। चारित्रात्माओं से कोई छोटी-मोटी गलती हो जाए तो उनकी प्रायश्चित और आलोयणा की वृत्ति रहनी चाहिए। आलोयणा लेने से हमारी सफाई होती रहती है। प्रतिक्रमण को भी शुद्ध रखने का प्रयास करना चाहिए। गलती का प्रायश्चित ले लेने से चारित्र निर्मल रह सकता है। विनय की भावना हो तो शील की प्राप्ति हो सकती है।
मंगल प्रवचन के उपरान्त पूज्य प्रवर ने चारित्रात्माओं को जिज्ञासा रखने का अवसर प्रदान किया तो चारित्रात्माओं ने अपनी जिज्ञासाएं प्रस्तुत की और पूज्य प्रवर ने उनका समाधान प्रदान किया। तदुपरांत आचार्य प्रवर जैन श्वेतांबर तेरापंथी महासभा द्वारा नवनिर्मित भवन ‘अभ्युदय’ एवं उसके अन्तर्गत बने उपासक साधना केन्द्र में पधारे। आचार्यश्री से मंगल पाठ का श्रवण कर भवन के निर्माण कर्त्ता व अनुदान दाता जयंतीलाल सुराणा, विजय, सुयश सुराणा परिवार ने भवन का लोकार्पण किया। सुरेशचंद गोयल मुख्य न्यासी ने भवन के संदर्भ में अवगति दी। जयंतीलाल सुराणा व उपासक श्रेणी के राष्ट्रीय संयोजक सूर्यप्रकाश श्यामसुखा ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। इस संदर्भ में आचार्य प्रवर ने उपासक-उपासिकाओं को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया और उपासक-उपासिकाओं को विधिवत प्रशिक्षण प्रदान करते हुए उपासक साधना केन्द्र का प्रायोगिक शुभारंभ भी किया।