गुरुवाणी/ केन्द्र
राग चेतना से वैराग्य चेतना की ओर बढ़ने का प्रयास रहे :आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, तीर्थंकर महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। साध्वी वृन्द ने प्रज्ञा गीत का संगान किया। तत्पश्चात् युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आर्हत् वाङ्मय के माध्यम से समुपस्थित श्रद्धालुओं को अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि जैन श्वेतांबर आम्नाय में बत्तीस आगम मान्य है। इनमें ग्यारह अंग, बारह उपांग, चार मूल, चार छेद और एक आवश्यक है। सभी आगम प्रमाण के रूप में सम्मत हैं। इनमें एक आगम है - उत्तरज्झयणाणि। इस आगम में तत्त्व ज्ञान भी उपलब्ध होता है और घटनाओं व कथानक के माध्यम से भी कुछ देने का प्रयास हुआ है। अध्यात्म की दृष्टि से साधक आत्मा को एक सुंदर दिशा-निर्देश प्राप्त हो सकता है। परिषहों को सहन करने का सुंदर शिक्षण हमें इस आगम के दूसरे अध्ययन से प्राप्त होता है। कई चारित्रात्माएं इस आगम को कंठस्थ करने का भी प्रयास करते हैं।
जिन शासन में ज्ञान का बहुत महत्त्व है। ज्ञान अध्यात्म विद्या का भी होता है तो लौकिक विद्या का भी हो सकता है। जो चारित्रात्माएं हैं, उनको किस प्रकार के ज्ञान को ग्रहण करने का अधिक प्रयास करना चाहिए, यह एक विवेच्य बात हो सकती है। एक ज्ञान वह होता है जिसे ग्रहण करने से आत्मोत्थान की प्रेरणा मिल सकती है, सुंदर आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त हो सकती है। दूसरे ऐसे ग्रन्थ भी हैं, जिनका अध्यात्म से सीधा संबंध नहीं होता, अपितु जिनको ज्यादा पढ़ने से मन में अपवित्रता भी आ सकती है।
यद्यपि ज्ञान की जहां तक बात है, वह अपने आप में शुद्ध है। क्योंकि ज्ञेय तो नव ही तत्त्व हैं, परन्तु उनमें हेय भी हैं और उपादेय भी हैं। जो ग्रहण करने योग्य हो, जिस ज्ञान से आत्मा का कल्याण हो, उसी ज्ञान को जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए। ज्ञान होने के बाद किस चीज को छोड़ना और किसे अपने जीवन का अंग बनाना, यह विवेक का विषय होता है। जिस ज्ञान से अध्यात्म की दिशा तय हो, जिससे मन में वैराग्य के भाव उत्पन्न हो जाएं, वैसे ज्ञान को ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए। वह ज्ञान हितावह भी हो सकता है। जिन शासन में वह ज्ञान है, वह आध्यात्मिक ज्ञान है जिससे राग से विराग की ओर गति हो जाए। व्यक्ति राग-चेतना से वैराग्य चेतना की ओर बढ़ जाए, भोग से योग की ओर गति हो जाए, मनोरंजन से आत्म रंजन की ओर प्रगति हो जाए, वैसे ज्ञान को ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए।
साधुओं को और विशेष रूप से छोटे साधुओं को अपने सुबह के समय का उपयोग आध्यात्मिक ज्ञान को सीखने में करने का प्रयास करना चाहिए। ज्ञान प्राप्त करने के बाद व्यक्ति को विनीत और अविनीत की पहचान भी अच्छे ढंग से हो जाती है। जो साधु आज्ञा, निर्देश का पालन करने वाले, आगम व गुरु की आज्ञा, निर्देश का पालन करने वाले होते हैं, वे विनीत होते हैं। मंगल प्रवचन के उपरान्त पूज्य प्रवर ने आज भी जिज्ञासा प्रदान करने का अवसर प्रदान किया।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में आज शासन श्री साध्वी सरोजकुमारी (मुंबई) की स्मृति सभा हुई। आचार्य प्रवर ने उनके जीवन का संक्षिप्त परिचय प्रदान किया और उनकी आत्मा के प्रति आध्यात्मिक मंगलकामना की। आचार्य प्रवर के साथ चतुर्विध धर्म संघ ने चार लोगस्स का ध्यान किया। तदुपरांत मुख्य मुनिश्री महावीर कुमारजी, साध्वी प्रमुखा श्री विश्रुत विभाजी, साध्वी वर्या श्री संबुद्धयशाजी ने उनकी आत्मा के प्रति आध्यात्मिक मंगल कामना की। उनकी सहवर्ती साध्वी चिराग प्रभाजी, गुजरात की साध्वियों व समणीवृंद ने समूह रूप में गीत की प्रस्तुति दी। शासन गौरव साध्वी कनकश्रीजी, साध्वी लब्धिश्रीजी, साध्वी रचनाश्रीजी व समणी कुसुम प्रज्ञाजी ने उनके प्रति अपनी भावांजलि दी। साध्वी श्री सरोज कुमारीजी की सहवर्तिनी साध्वी वृंद ने गीत का संगान किया। मुनि कमलकुमारजी ने भी भावांजलि दी। उनके संसार पक्षीय परिवार की ओर से भारती झवेरी, योगक्षेम वर्ष प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष प्रमोद बैद, तेरापंथ महिला मंडल-लाडनूं की अध्यक्षा शोभा ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।