धर्म है उत्कृष्ट मंगल

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाश्रमण

धर्म है उत्कृष्ट मंगल

कालूयशोविलास आचार्य श्री तुलसी द्वारा प्रणीत एक गेय काव्य है। इसका अध्येता न केवल तेरापंथ के अष्टमाचार्य श्री कालू के जीवन-चरित्र से परिचित होता है अपितु अनेक आनुषंगिक उपलब्धियों का भी वरण करता है। उनमें मुख्य हैं–
१. आगमिक तथ्यों की जानकारी
२. प्राचीन राग-रागिनियों से परिचय
३. संस्कृत, हिन्दी व राजस्थानी के शब्द-संग्रह की वृद्धि
४. काव्य-प्रणयन-कौशल
५. विविध छन्दों का ज्ञान
प्रस्तुत कृति में तत्त्व-विवेचना अनेक विधाओं में हुई है। उपमा अलंकार में भी तत्त्व का
उपयोग किया गया है। शास्त्रार्थ के अनेक प्रसंग भी तत्त्व-निरूपण के माध्यम बने हैं। भगवत्-स्तुति में भी सैद्धान्तिक प्रस्तुति हुई है। कालू यशोविलास में यत्र-तत्र विकिर्ण तत्त्व-मुक्ताओं
का प्राचुर्य है, पर तीसरे उल्लास की छठी, सातवीं और आठवीं ये तीनों गीतिकाएं तत्त्वज्ञान की दृष्टि से कृतिकार की अत्यन्त कृपापात्र प्रतीत होती हैं। उनमें दया, दान, अनुकम्पा के दो भेद, भगवान महावीर छद्मस्थ अवस्था में चूके, मिथ्यात्वी की करणी निरवद्य, छठे गुणस्थान में छह लेश्याओं की स्वीकृति, देशव्रती में अप्रत्याख्यान क्रिया, आर्या द्वारा आनीत भोजन साधुओं के लिए भोज्य है-आदि तथ्यों की विशद विवेचना की गई है। प्रस्तुत ग्रन्थ की कुछ तात्त्विक झलकियां इस प्रकार हैं–
१. निर्जरा और पुण्य का साहचर्य
पूज्य डालगणी व मुनि कालू के साहचर्य का वर्णन करते हुए कविवर ने लिखा है–
जिण-जिण ग्राम नगर पुर विचरै, ले ले लम्बो गेड़ जी।
छोगां-अंगज संग रहै, ज्यूं पुण्य धरम रै केड़ जी।।
(का. १/९/१५)
जैसे पुण्य निर्जरा-धर्म के साथ होता है, निर्जरा से पृथक, स्वतंत्र रूप से पुण्य का बन्ध नहीं होता, वैसे ही मुनि कालू डालगणी के साथ रहते थे। वे स्वतंत्र विहार नहीं करते थे।
स्वतंत्र पुण्य का बन्ध भी जैनाचार्यो द्वारा सम्मत है। पर आचार्य भिक्षु का मत है कि निर्जरा के साथ ही पुण्य-बंध हो सकता है। शुभ योग से दो कार्य निष्पन्न होते हैं-पूर्वबद्ध पाप कर्मों की निर्जरा और पुण्य का बंध। निष्पत्ति की अपेक्षा शुभयोग द्वीप बन जाता है। शुभ योग आश्रव और शुभ योग निर्जरा। इन दोनों के अपने-अपने कारण हैं। शुभयोग की प्रवृत्ति के दो कारण हैं–
मोहकर्म का वियोग (उपशम, क्षय, क्षयोपशम) तथा नाम कर्म का उदय। मोहकर्म का संयोग योग को अशुभ और मोहकर्म का वियोग उसे शुभ बनाता है। शुभ योग में मोहकर्म का वियोग रहता है। इसलिए उससे निर्जरा होती है। कवि प्रवर ने धर्म और पुण्य के एक दार्शनिक तथ्य को उपमा के रूप में प्रयुक्त किया है।
२. 'अष्ट' शब्द के द्वारा अनेक तात्त्विक विज्ञप्तियां
आचार्यश्री कालूगणी तेरापंथ धर्मसंघ के अष्टमाचार्य थे। 'आठ' अंक के माहात्म्य को प्रदर्शित करते हुए काव्यकार ने आठ-आठ की संख्या वाले नौ तथ्यों का नामोल्लेख किया है–
अष्ट कर्म-अरि दल दली, हो अष्टम गुणठाण।
अष्ट इला-तल ऊपरै, अष्ट महागुण-ठाण।।
गन्तुमना सुमना सदा, अष्ट मातृ-पद लीन।
महामना मथ अष्ट मद, अष्टम पद आसीन ।।
अष्ट सिद्धि आगम कथित, अष्ट आप्त-प्रतिहार्य।
अष्ट रुचक रुचिकर बणे अष्ट अंक अविकार्य ।।