तेरापंथ-मेरापंथ कार्यशाला का आयोजन

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उत्तरपाड़ा।

तेरापंथ-मेरापंथ कार्यशाला का आयोजन

युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि जिनेश कुमार जी ठाणा-3 के सानिध्य में जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के निर्देशन में तेरापंथ-मेरापंथ कार्यशाला का आयोजन जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा, उतरपाड़ा द्वारा माखला स्थित रितिज हॉल में किया गया। कार्यशाला में प्रशिक्षक, उपासक सुरेन्द्र सेठिया थे। कार्यशाला में लगभग 68 संभागी थे। इस अवसर पर उपस्थित धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि जिनेश कुमार जी ने कहा - आचार्य भिक्षु तेरापंथ धर्म संघ के संस्थापक थे। उन्होंने आचार विचार व्यवस्थागत में आई शिथिलता को दूर करने के लिए धर्म क्रांति की, वह धर्म क्रांति तेरापंथ के रूप में विख्यात हुई। आचार्य भिक्षु विचक्षण, विलक्षण, नक्षत्री महापुरुष थे। वे अखंड पुन्यो के पंज, मारवाड़ के घोरि, चिन्तनशील, आत्मार्थी पापभीरू आचार्य को तेरापंथ की पहचान एक आचार एक विचार एक आचार्य, एक संविधान, एक गुरु की परंपरा ही तेरापंथ का अर्थ है। आत्मोत्सर्ग अहंकार और ममकार का विसर्जन तेरापेथ का हार्ट है। साध्य के लिए साधन भी शुद्ध होना चाहिए। संयमी दान मोक्ष का मार्ग और असंयमी दान संसार का मार्ग। ज्ञानदान, अभयदान संयतिदान, धर्मदान के भेद है। सुपात्रदान, जागरूकता, संयम, समता धर्म‌ के तत्व हैं। जो मूर्छा में जीते है वे मूर्ख होते हैं। जो जागृत अवस्था में जीते हैं वे समझदार होते है। जागरूकता के बिना साधना संभव नही। सभी श्रावक‌ श्राविकाओं को तेरापंथ मेरापंथ के दर्शन को समझना चाहिए। इस अवसर पर मुनि परमानंद ने कहा- आचार्य भिक्षु साधना में दृढ़ थे। उन्होंने धर्मक्रांति कर तेरापंथ का मार्ग दिखलाया। कार्यक्रम का शुभारंभ मुनि कुणाल कुमार जी के मंगलाचरण से हुआ। स्वागत भाषण श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा, उत्तरपाड़ा के अध्यक्ष निकेश सठिया ने किया। इस अवसर पर उत्तरपाड़ा की बहनों ने सुमधुर गीत का संगान किया। उत्तर पाड़ा नगरपालिका के चेयरमेन दिलीप यादव ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का संचालन मुनि परमानंद ने किया।