'वीतराग कल्प' मघवागणी जैसी समता का लक्ष्य रहे : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 08 मार्च, 2026

'वीतराग कल्प' मघवागणी जैसी समता का लक्ष्य रहे : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर धर्मसंघ के ग्यारहवें और वर्तमान अधिशास्ता, महातपस्वी युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने ‘सुधर्मा सभा’ में अपनी पावन देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि वीतराग व्यक्ति कर्म क्षय करता है। मोहनीय कर्म का संपूर्णतया क्षय हो जाने पर साधु क्षीणमोह वीतराग बन जाता है। बारहवें गुणस्थान की संपन्न्ता पर तेरहवें गुणस्थान के पहले समय में वीतराग साधु ज्ञानावरणीय कर्म का पूर्णतया क्षय कर देता है, दर्शन को आवृत्त करने वाले कर्म का भी क्षय कर देता है और फिर अन्तराय कर्म का भी नाश कर देता है। इस प्रकार पहले मोहनीय कर्म और फिर शेष तीन कर्म ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय और अन्तराय का नाश तेरहवें गुणस्थान में हो जाता है।
आज के विषय ‘वीतराग कल्प मघवा’ के संदर्भ में गुरुदेव ने कहा कि आज चैत्र कृष्णा पंचमी है। हमारे धर्म संघ के पंचम आचार्य ‘वीतराग कल्प’ मघवागणी का आज महाप्रयाण दिवस है। वि.सं. 1949 चैत्र कृष्णा पंचमी को सरदारशहर में जम्मड़ परिवार की हवेली में मधवागणी ने अंतिम श्वास लिया था। लगभग बावन वर्षों का उनका जीवन काल आज के दिन संपन्न हुआ था। वे बाल्यावस्था में लाडनूं में दीक्षित हुए और उन्हें जयाचार्य प्रवर जैसे प्रज्ञा पुरूष के सान्निध्य में रहने का अवसर मिला। मघवागणी ने जयाचार्य के युवाचार्य रहते हुए आगम कार्यों में बहुत सहयोग किया। इतने सक्षम युवाचार्य के सहयोग के कारण ही जयाचार्य भगवती जोड़ जैसे विशाल ग्रंथ और अन्य ग्रंथों की रचना में अपना समय नियोजित कर सके और कार्य की संपन्नता की। मघवागणी का स्वभाव बहुत ही शांत व कोमल थे। वे अजात शत्रु थे। एक प्रसंग में अपने गुरु जयाचार्य की डांट और उपालंभ को युवाचार्य जैसे महत्वपूर्ण पद पर होते हुए भी भरी सभा में अत्यंत समता और विनय भाव से सहन किया। मघवागणी तेरापंथ धर्मसंघ के प्रथम संस्कृत विद्वान भी माने जाते हैं। उनका युवाचार्य काल अधिक और आचार्य काल कम रहा, परन्तु उनका जीवन और उनकी साधना हमें निरंतर प्रेरणा देती है।
अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस के संदर्भ में परम पूज्य गुरुदेव ने प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि हमारे धर्मसंघ में गुरुदेव तुलसी के विशेष अवदान से साध्वी समाज, समणी समुदाय का बहुत विकास हुआ है। तेरापंथ महिला मंडल का अवदान महिला जाति के लिए उपकार है। महिलाएं आध्यात्मिक व धार्मिक हर क्षेत्र में अपना विकास करती रहे, यह मंगल कामना है। मंगल प्रवचन के उपरांत आचार्य प्रवर की सन्निधि में शासन श्री साध्वी विद्यावती जी (प्रथम) की स्मृति सभा का आयोजन हुआ। गुरुदेव ने साध्वी श्री का संक्षिप्त परिचय प्रदान करते हुए कहा कि साध्वी विद्यावती जी ने वि.सं. 2008 में गुरुदेव तुलसी के मुखारविंद से दीक्षा ग्रहण की थी। उन्होंने लगभग 48 वर्षों तक साध्वी केसर जी के साथ रहकर ज्ञानार्जन और सेवा के उत्कृष्ट कार्य किए। वे अनेक आगमों को कंठस्थ करने वाली, शिल्पकला में निपुण और डाक्टरी सेवा में भी दक्ष साध्वी थी। गत 3 मार्च 2026 को सादुलपुर (राजगढ़) में उनका देवलोकगमन हो गया। उनकी आत्मा के ऊर्ध्वारोहण के लिए मंगल कामना। चतुर्विध धर्म संघ ने चार लोगस्स का ध्यान किया। तत्पश्चात् मुख्य मुनि श्री महावीर कुमारजी, साध्वी प्रमुखा श्री विश्रुतविभाजी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। सादुलपुर के श्रावक समाज एवं साध्वीश्रीजी के संसारपक्षीय ज्ञातिजनों ने गीत और विचारों के माध्यम से अपनी भावांजलि दी।