गुरुवाणी/ केन्द्र
साधु दिनचर्या में जनोपकार, संघोपकार और आत्मोपकार का रहे लक्ष्य : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, शांतिदूत, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी के पावन सान्निध्य में लाडनूं की धरा पर योगक्षेम वर्ष के कार्यक्रम गतिमान है। कार्यक्रम का शुभारंभ पूज्य गुरुदेव के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ हुआ। तदुपरान्त युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन संबोध करते हुए फरमाया कि साधु जीवन में स्वाध्याय का बहुत महत्त्व है और ध्यान का निर्देश भी हमें आगम वाङ्मय में प्राप्त होता है। साधु का जीवन सम्यकत्व संवर और सर्व विरति संवर से संपन्न होता है। अप्रमाद संवर भी हो सकता है अर्थात् साधु का जीवन संवरमय होता है। जहां जहां साधुत्व है वहां-वहां संवर होगा ही और जहां संपूर्ण रूप में विरति संवर है वहां अवश्य साधुत्व होगा। अतः संवर के बिना साधुत्व नहीं हो सकता।
संवर और निर्जरा, इन दोनों तत्त्वों का अपना-अपना महत्त्व है, परन्तु संवर ज्यादा गरिमा वाला और महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। कोई व्यक्ति यदि तपस्या नहीं भी करे परन्तु यदि वह संवर की साधना करता है तो मुक्ति अवश्य ही होगी। कोरी तपस्या से मुक्ति हो ही जाए यह नियम नहीं है। अभव्य जीव की भी तपस्या, निर्जरा हो सकती है पर उसकी मुक्ति नहीं हो सकती। इसीलिए संवर को मोक्ष का कारण कहा गया है। यदि संवर की साधना संपुष्ट है तो कर्मों का झड़ना अवश्य होगा।
साधु का जीवन संवर मय होता है साथ ही शुभ योग से निर्जरा भी होती है। साधु की दैनिक चर्या का एक ऐसा मॉडल होना चाहिए जो साधु की दिनचर्या के लिए दिशा निर्देश प्रदान कर सके। मॉडल ऐसा हो जिसमें जनोपकार, संघोपकार और आत्मोपकार का यथासंभव हो सके। यद्यपि हमारे संघ में 75 के लिए 'सुप्रणिधान साधना' का एक प्रारूप तैयार किया गया है, जिसमें वे इच्छा होने पर अग्रणी का दायित्व छोड़कर खान-पान और जनसंपर्क को सीमित कर अपनी प्रकृष्ट साधना, स्वाध्याय और कषाय मुक्ति में अधिक समय लगा सकें। इस संदर्भ में पूज्य प्रवर ने सुप्रणिधान साधना की धाराओं की संक्षिप्त जानकारी प्रदान की।
आचार्य प्रवर ने आज के निर्धारित विषय 'अकेले ध्यान करो' के संदर्भ में कहा कि आगम में कहा गया है कि अकेले ध्यान करो। ध्यान अकेले किया जा सकता है परन्तु स्वाध्याय में कई बार दूसरे की आवश्यकता पड़ सकती है। जैसे कोई पढ़ाने वाला भी हो और पढ़ने वाला भी होना चाहिए। कभी समूह रूप में भी स्वाध्याय किया जा सकता है। परन्तु ध्यान तो अकेले ही किया जाता है। शरीर को स्थिर करना, चित्त को एकाग्रचित करना या निर्विचारता में जाना यह व्यक्ति अकेले ही बैठकर कर सकता है। कभी रात को नींद टूट जाए तो दो-तीन बजे उठकर कायोत्सर्ग, ध्यान किया जा सकता है, जप भी किया जा सकता है। प्रवचन के पश्चात् पूज्य प्रवर ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाएं सुनकर उनका समाधान प्रदान किया।