संयमित और सारपूर्ण बोलने का प्रयास रहे :आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 05 मार्च, 2026

संयमित और सारपूर्ण बोलने का प्रयास रहे :आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने ‘बहुत मत बोलो’ विषय पर आगम आधारित पावन देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि विकसित भाषा लब्धि का होना प्रगति की पहचान है और भाषा का उपयोग हमारे व्यवहार का एक सक्षम आधार है। जो व्यक्ति सूक्ष्मता और निपुणता से सुनता है, वह श्रोता कभी एक वक्ता भी बन सकता है। एक व्यक्ति के बैठने की मुद्रा, कंठ की आवाज, हाव-भाव, आदि बाह्य चीजें प्रवचन का ‘शरीर’ है जबकि वक्ता का ज्ञान, अध्ययन, और उसका अनुभव उस प्रवचन की ‘आत्मा’ या प्राण तत्त्व होते हैं। क्षेत्रों में विचरण के दौरान साधु-साध्वियों में जिसकी भी व्याख्यान देने की ड्यूटी हो, उसे पूर्व तैयारी करनी चाहिए।
समयबद्धता का ध्यान रखना चाहिए। श्रोता ध्यान से सुनें या ना सुनें, यदि वक्ता ‘अनुग्रह बुद्धि’ से बोलता है, तो उसका स्वयं का हित और आत्मविकास अवश्य होता है। परम पूज्य आचार्य प्रवर ने प्रेरणा देते हुए कहा कि अणुव्रत, नैतिकता और सद्भावना का संदेश जेल, विद्यालयों, विद्या संस्थाओं और बाजार के चौराहों तक भी पहुंचना चाहिए। आचार्यप्रवर ने फरमाया कि बात सारगर्भित होनी चाहिए, बात को अनावश्यक लंबा करना और उसमें सार न होना ये वाणी के दो दोष हैं। इसके विपरीत संयमित बोलना और सारपूर्ण बोलना वाणी के गुण होते हैं। वाचालता व्यक्ति को लघु बनाने वाली हो सकती है जबकि मौनशीलता उन्नति की ओर ले जाने वाली होती है। अतः व्यक्ति को हमेशा सोच-समझकर और तौलकर ही बोलना चाहिए। मितभाषी होना सच्चाई की साधना में भी सहयोगी बनता है। वाणी संयम व्यवहार प्रशिक्षण का एक बहुत अच्छा सूक्त है, जिसकी हम सभी को अपने जीवन में आराधना करनी चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरांत पूज्य गुरुदेव ने साधु-साध्वियों, समणियों से जिज्ञासा आमंत्रित की और उनका समाधान प्रदान किया। तदुपरांत जैन विश्व भारती द्वारा प्रज्ञा पुरस्कार का आयोजन हुआ जिसके अंतर्गत अभय दुग्गड़ (बेंगलुरु-जयपुर) को यह पुरस्कार प्रदान किया। जैन विश्व भारती के अध्यक्ष अमरचंद लुंकड़, मुख्य न्यासी जयंतीलाल सुराणा, जैन विश्व भारती मान्य विश्वविद्यालय के कुलपति बच्छराज दुगड़, योगक्षेम प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष प्रमोद बैद ने यह पुरस्कार अभय दुगड़ को प्रदान किया। राजेंद्र खटेड़ ने परिचय प्रदान किया।