गुरुवाणी/ केन्द्र
शिक्षा–परीक्षा–समीक्षा के बाद बन सकता है दीक्षा का योग : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, तीर्थंकर महावीर के प्रतिनिधि, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में आज जैन भगवती दीक्षा समारोह आयोजित हुआ, जिसमें तीन मुमुक्षुओं - प्रिया महनोत, रक्षा ओस्तवाल और प्रिशा गादिया ने संसार का मार्ग छोड़कर संन्यास और संयम का मार्ग स्वीकार किया। आज के समारोह की विशेष बात यह रही कि मात्र 10 वर्षीय बालिका प्रिशा गादिया ने इतनी अल्प आयु में दीक्षा अंगीकार की। आज के कार्यक्रम का शुभारंभ साध्वीवृंद द्वारा प्रज्ञा गीत के संगान के साथ हुआ। दीक्षा संस्कार से पूर्व मुमुक्षु भावना नाहटा ने दीक्षार्थियों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया। तत्पश्चात् पारमार्थिक शिक्षण संस्था के बजरंग जैन ने दीक्षार्थियों के परिजनों के आज्ञा पत्रों का वाचन किया। परिजनों ने आज्ञा पत्र पूज्य गुरुदेव के चरणों में सौंपे। तीनों दीक्षार्थियों ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। तदुपरान्त परम पूज्य गुरुदेव ने भगवान महावीर, आचार्य भिक्षु और पूर्व आचार्यों का स्मरण कर आगम सूक्तों के वाचन के साथ तीनों मुमुक्षुओं को संयम जीवन प्रदान किया। साध्वी प्रमुखा श्री विश्रुत विभाजी ने नवदीक्षित साध्वियों का केश लुचन किया। केश लुंचन के पश्चात् नवदीक्षितों को साधु चर्या का अभिन्न अंग ‘रजोहरण’ प्रदान किया।
साध्वी प्रमुखा श्री विश्रुत विभाजी ने अपने उद्बोधन में कहा कि जो व्यक्ति आत्म विद्या के रहस्यों को जानने के लिए तत्पर होता है वह दीक्षा के मार्ग को स्वीकार करता है। उनका एक ही लक्ष्य होता है अपनी आत्मा का अभ्युदय करना, आत्मा का विकास करना। उन्होंने तीनों नवदीक्षितों के लिए मंगलकामना करते हुए कहा कि गुरुदेव के इंगितानुसार चल कर अपने जीवन के मार्ग को प्रशस्त करती रहे। आचार्य प्रवर ने पावन संबोध प्रदान करते हुए फरमाया कि पहले शिक्षा होती है, फिर परीक्षा और फिर अन्त में समीक्षा के बाद दीक्षा का क्रम आता है। दीक्षा कोई सामान्य कार्य नहीं है, इसमें जीवन भर के लिए सर्व-सावद्य योग का त्याग किया जाता है और गुरु के अनुशासन में रहना होता है। आगम के अनुसार ‘समय पर अध्ययन हो।’ नवदीक्षित साध्वियों का स्वाध्याय निरंतर चलना चाहिए क्योंकि स्वाध्याय संयम की असली खुराक है।
स्वाध्याय के साथ ही उच्चारण शुद्धि का भी बहुत महत्त्व है। ज्ञान के संदर्भ में केवल सूत्र पाठ ही नहीं बल्कि अर्थ का भी अवबोध होना चाहिए ताकि आगम की बातें दिशा-निर्देशक बन सकें। इन सबके साथ मन में सेवा की प्रबल भावना रहनी चाहिए। अपनी सामर्थ्यनुसार बीमार, वृद्ध, और सेवा सापेक्ष चारित्रात्माओं की यथायोग्य सेवा करें। नवदीक्षितों को संभालना, उन्हें संस्कार देना और तैयार करना भी बहुत बड़ी आध्यात्मिक सेवा है।