निष्ठुरता से बचने का प्रयास रहना चाहिए :आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 04 मार्च, 2026

निष्ठुरता से बचने का प्रयास रहना चाहिए :आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में योगक्षेम वर्ष के कार्यक्रम गतिमान हैं। आज के कार्यक्रम का शुभारंभ पूज्य गुरुदेव के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ हुआ। साध्वी वृंद द्वारा प्रज्ञा गीत का संगान किया गया। तदुपरान्त महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आर्हत् वाङ्मय के आधार पर अमृत देशना प्रदान करते हुए कहा कि शास्त्र में कहा गया है - ‘निष्ठुरता से बचें।’ हमारे भीतर कषाय का जगत है और क्रोध, मान, माया, लोभ विद्यमान हैं। मोह का सत्ता रूप ग्यारहवें गुणस्थान तक रहता है। ग्यारहवें गुणस्थान में मोहकर्म का बिल्कुल उदय नहीं होता परन्तु सत्ता रहती है। जो साधक उपशम श्रेणी से आगे बढ़ता है वह मोह को उपशांत करता हुआ आगे बढ़ता है और ग्यारहवें गुणस्थान में पूर्णतया उपशांत मोह की स्थिति बन जाती है। आठवें गुणस्थान से दो मार्ग निकलते हैं- एक उपशम श्रेणी का मार्ग और दूसरा क्षपक श्रेणी का मार्ग। जो साधक उपशम श्रेणी का मार्ग स्वीकार करता है वह अपने कषायों को उपशांत करता हुआ आगे बढ़ता है, क्षीण नहीं करता। ग्यारहवें स्थान में यदि साधक पहुंच गया तो उसे लौटना ही पडे़गा क्योंकि ग्यारहवां गुणस्थान बंद गली के समान है, इसके आगे कोई मार्ग है ही नहीं, अर्थात् वह नीचे के गुणस्थानों में निश्चित रूप से आएगा। क्षपक श्रेणी का मार्ग स्वीकार करने वाला जीव अपने कषायों को क्षीण करता हुआ दसवें गुणस्थान के पश्चात् सीधे बारहवें गुणस्थान में पहुंचता है, ग्यारहवें गुणस्थान का स्पर्श ही नहीं करता। बारहवें गुणस्थान में मोह पूर्णतया क्षीण हो जाता है फिर तेरहवां व चौदहवां गुणस्थान और उसके पश्चात् मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।
हमारी पारंपरिक मान्यता के अनुसार वर्तमान व्यवस्था में सातवें गुणस्थान से आगे नहीं बढ़ा जा सकता। छठे-सातवें गुणस्थान में कभी कषाय की उद्दीप्तता भी हो सकती है। छठे गुणस्थान का नाम प्रमत्त संयत है अतः उसमें प्रमाद आश्रव होता ही है। साधु से कभी कभी अशुभ योग रूपी प्रमाद हो सकता है। प्रमाद वश साधु से जीव हिंसा हो सकती है, असत्य बात निकल सकती है और मूर्च्छा भी आ सकती है और साधुपन में दोेष लग सकता है। शास्त्र में कहा गया है कि साधु को निष्ठुरता का कर्म नहीं करना चाहिए। चांडालिक-निष्ठुर कर्मों से बचने का प्रयास करना चाहिए। कभी आक्रोश हो जाए तो मन में झुंझलाहट आ जाने से मनोयोग अशुभ हो जाता है। कुछ बोल दिया तो वचन योग और क्रोध में कोई शारीरिक चेष्टा यदि कर दें तो काय योग भी अशुभ हो सकता है। अतः साधु को निष्ठुरता से बचना चाहिए। कोई बड़ा साधु उलाहना भी दे दे तो उसे विनम्रतापूर्वक सहन कर छोटे साधु को विनय भाव रखना चाहिए। बड़े साधु को भी अनावश्यक तेजी नहीं लानी चाहिए। शांतिपूर्वक सहन करने से कर्म निर्जरा का लाभ भी हो सकता है और स्वयं का उत्थान भी हो सकता है। विनयवान आदमी को ऊंची स्थितियां प्राप्त हो सकती है। अतः साधु को निष्ठुरता से बचना चाहिए। प्रवचन के उपरान्त पूज्य प्रवर ने चारित्रात्माओं को अपनी जिज्ञासाएं प्रस्तुत करने का अवसर दिया और प्रस्तुत की गई जिज्ञासाओं का समाधान प्रदान किया।