स्वाध्याय
धर्म है उत्कृष्ट मंगल
१. आठ कर्म– जैन अध्यात्म-मीमांसा में आठ कर्म प्रतिपादित हैं। उन्हें क्षीण कर मनुष्य परमात्मा बनता है।
२. अष्टम गुणस्थान– जैन धर्म के अनुसार मोक्ष के चौदह सौपान हैं। पारिभाषिक शब्दावली में उन्हें जीवस्थान और गुणस्थान कहा जाता है। बीच में एक दुराहा आता है। वह है आठवां गुणस्थान। यहां से एक मार्ग उपशम श्रेणी का तथा दूसरा मार्ग क्षपक श्रेणी का निकलता है।
उपशम श्रेणी के पथ पर चलने वाला साधक अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं हो सकता, उसे लौटना पड़ता है। क्षपक श्रेणी के मार्ग पर चलने वाला साधक निश्चित रूप से अपने लक्ष्य को प्राप्त हो जाता है।
३. आठ पृथ्वियां – जैन विश्व मिमासां (कोस्मोलोजी) के अनुसार आठ पृथ्वियां हैं–
१. रत्नप्रभा २. शर्कराप्रभा ३. बालुकाप्रभा
४. पंकप्रभा ५. धूमप्रभा ६. तमःप्रभा
७. तमस्तमःप्रभा ८. ईषत्प्राग्भारा।
४. आत्मा के आठ गुण– १. केवल ज्ञान २. केवल दर्शन ३. असंवेदन ४. आत्मरमण
५. अटल अवगाहन ६. अमूर्ति ७. अगुरुलघुत्व ८. निरन्तरायता।
५. आठ प्रवचनमाताएं– पांच समितियां, तीच गुप्तियां।
६. आठ मदस्थान– जाति, कुल, बल, रूप, तपस्या, लाभ, श्रुत, ऐश्वर्य।
७. आठ सिद्धियां– लघिमा, वशिता, ईशित्व, प्राकाम्य, महिमा, अणिमा, कामावसायित्व, प्राप्ति।
८. आठ प्रातिहार्य– १. अशोकवृक्ष २. सुरपुष्पवृष्टि ३. दिव्यध्वनि ४. देवदुन्दुभि,
५. स्फटिक सिंहासन, ६. धर्मचक्र, ७. छत्र, ८. चामर।
'प्रातिहार्य' शब्द का एक अर्थ है जादुई या चामत्कारिक। अर्थात् तीर्थकरों के वे अतिशय जो विलक्षण होते हैं, चमत्कार की तरह प्रतीत होते हैं। प्रातिहार्य का दूसरा अर्थ यह किया जाता है-प्रतिहार-द्वारपाल। द्वारपाल की तरह सेवा में जागरूक रहने वाले देवों द्वारा कृत तीर्थकरों के अतिशय।
६. आठ रूचक प्रदेश– जैन भूगोल-मीमांसा के अनुसार चौदह रज्ज्वात्मक लोक के असंख्य प्रतरों में सर्वक्षुल्लक प्रतर सुमेरू पर्वत के मध्य में होते हैं। उनमें चार ऊपर और चार नीचे गोस्तनाकार में आठ प्रदेश होते हैं। वे रूचक प्रदेश कहलाते हैं। लोकाकाश की भांति आत्मा के भी आठ रूचक प्रदेश होते हैं।
३. अनेकान्तवाद और स्याद्वाद
भगवान महावीर की स्तुति करते हुए रचनाकार ने उनके एक सिद्धान्त अनेकान्तवाद का संक्षिप्त वर्णन
किया है–
स्वंगी सत-भंगी सुखद सत-मत-संगी हेत।
व्यंगी एकांगी कृते झंगी सो दुःख देत ।।
इतर दर्शणी कर्षणी नय-वणिज्य-अनभिज्ञ ।
विज्ञ वणिग् जिनदर्शणी नय दुर्नय विपणिज्ञ।।
वस्तु अंश-ग्राही विशद अंशेतर-सापेक्ष।
नय-नयज्ञ-निर्दिष्ट है नयाभास-निरपेक्ष ।।
(का. २/उल्लास-प्रवेश ३-५)
अनेकान्तवाद एक सिद्धान्त है। स्याद्वाद उसकी प्रतिपादन की पद्धति है। स्वाद्वाद की सप्तभंगी सुप्रसिद्ध है। प्रमाण और नय ये अनेकान्त को दो प्रतिपादन-शैलियां हैं। दुर्नय अनेकान्त का विरोधी मार्ग है। प्रमाण की व्याख्या पद्धति में वस्तु का समग्र रूप प्रतिपाद्य बनता है, जबकि नय की व्याख्या-पद्धति में अन्य अंशों का खण्डन न करने वाला वस्तु का एक अंश ही प्रतिपाद्य बनता है। दुर्नय एकान्त मार्ग है।
उदाहरण स्वरूप–
स्यादयं घटः कर्थचित् यह घड़ा है - प्रमाण-वाक्य
घटोयम् यह घडा है - नय वाक्य
घट एवायम् यह घड़ा है ही - दुर्नय वाक्य