श्रमण महावीर

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाप्रज्ञ

श्रमण महावीर

भगवान ने ध्यान के क्षणों में अनुभव किया कि आत्मा सूर्य की भांति प्रकाशमय है, चैतन्यमय है। उसमें न जीवन है और न मृत्यु। न जीवन की आकांक्षा है और न मृत्यु का भय। देह और प्राण का योग मिलता है, आत्मा देही के रूप में प्रकट हो जाती है, जीवित हो जाती है। देह और प्राण का सम्बन्ध टूटता है, आत्मा देह से छूट जाती है, मर जाती है।
आत्मा देह के होने पर भी रहती है और उसके छूट जाने पर भी रहती है। फिर जीवन की आकांक्षा और मृत्यु का भय क्यों होता है? भगवान ने इस रहस्य को देखा और बताया कि आत्मा में आकांक्षा नहीं है। उसकी विस्मृति ही आकांक्षा है। आत्मा में भय नहीं है। उसकी विस्मृति ही भय है। भगवान की यह ध्वनि आज भी प्रतिध्वनित हो रही है- 'सब्बओ पमत्तस्स भयं' प्रमत्त को सब ओर से भय है। 'सव्वओ अप्पमत्तस्स णत्थि भयं' 'अप्रमत्त को कहीं से भी भय नहीं है।''
एक बार भगवान ने 'आर्यों! आओ', कहकर गौतम और श्रमणों को आमंत्रित किया। सभी श्रमण भगवान के पास आए। भगवान् ने उनसे पूछा- 'आयुष्मान् श्रमणो! जीव किससे डरते हैं? गौतम बोले- भगवान! हम नहीं समझ पाए इस प्रश्न का आशय। भगवान को कष्ट न हो तो आप ही इसका आशय हमें समझाएं। हम सब जानने के उत्सुक हैं।'
'आर्यों! जीव दुःख से डरते हैं।'
'भन्ते! दुःख का कर्ता कौन है?'
'जीव।'
'भन्ते! दुःख का हेतु क्या है?'
'प्रमाद।'
भन्ते! दुःख का अन्त कौन करता है?
'जीव।'
'भन्ते!' दुःख के अन्त का हेतु क्या है?
'अप्रमाद।'
इस प्रसंग में भगवान ने एक गम्भीर सत्य का उद्घाटन किया। भगवान कह रहे हैं कि भय और दुःख शाश्वत नहीं हैं। वे मनुष्य द्वारा कृत हैं। प्रमाद का क्षण ही भय की अनुभूति का क्षण है और प्रमाद का क्षण ही दुःख की अनुभूति का क्षण है। अप्रमत्त मनुष्य को न भय की अनुभूति होती है और न दुःख की।
कामदेव अपने उपासना-गृह में शील और ध्यान की आराधना कर रहा था। पूर्वरात्रि का समय था। उसके सामने अकस्मात् पिशाच की डरावनी आकृति उपस्थित हो गई। वह कर्कश ध्वनि में बोली- 'कामदेव! इस शील और ध्यान के पाखण्ड को छोड़ दो। यदि नहीं छोड़ोगे तो तलवार से तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े कर डालूंगा।' कामदेव अप्रमाद के क्षण का अनुभव कर रहा था। उसके मन में न भय आया, न कम्पन और न दुःख।
पिशाच को अपने प्रयत्न की व्यर्थता का अनुभव हुआ। वह खिसिया गया। उसने विशाल हाथी का रूप बना कामदेव को फिर विचलित करने की चेष्टा की। उसे गेंद की भांति आकाश में उछाला। नीचे गिरने पर पैरों से रौंदा। पर उसका ध्यान भंग नहीं कर सका।
पिशाच अब पूरा सठिया गया। उसने भयंकर सर्प का रूप धारण किया। कामदेव के शरीर को डंक मार-मारकर बींध डाला। पर उसे भयभीत नहीं कर सका। आखिर वह अपने मौलिक देवरूप में उपस्थित हो वहां से चला गया। प्रमाद अप्रमाद से पराजित हो गया।
भगवान महावीर चंपा में आए। कामदेव भगवान् के पास आया। भगवान ने कहा- 'कामदेव! विगत रात्रि में तुमने धर्म-जागरिका की?'
'भन्ते ! की।'
'तुम्हें विचलित करने का प्रयत्न हुआ?'
'भन्ते ! हुआ।'
'बहुत अच्छा हुआ, तुम कसौटी पर खरे उतरे ।'
'भन्ते! यह आपकी धर्म-जागरिका का ही प्रभाव है।'