विशिष्ट बनने के लिए शिष्ट होना आवश्यक :आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 26 मार्च, 2026

विशिष्ट बनने के लिए शिष्ट होना आवश्यक :आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के अधिशास्ता और युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए जीवन में विनय और अनुशासन के महत्व पर प्रकाश डाला। 'उत्तरज्झयणाणि' आगम के 'विणयसुत्तं' अध्ययन के आधार पर आचार्यश्री ने फरमाया कि संसार में हर व्यक्ति विशिष्ट बनना चाहता है, लेकिन विशिष्टता का मार्ग शिष्टता से होकर गुजरता है। जो व्यक्ति अनुशासित और शालीन है, वह स्वतः ही विशिष्ट बन जाता है। विद्या की शोभा विनय से ही : आचार्य प्रवर ने शास्त्र की व्याख्या करते हुए फरमाया कि शास्त्र वे हैं जो शासन करते हैं और त्राण (रक्षा) प्रदान करते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि आगमों के निर्देश साधु समुदाय को मर्यादित रखते हैं और उनके अनुसार आचरण करने से जीव पाप कर्मों से मुक्त होता है। पूज्य प्रवर ने फरमाया, 'विद्या विनय से ही शोभित होती है। एक सच्चा ज्ञानी वही है जो अपने ज्ञान का अहंकार नहीं करता और न ही उसका निरर्थक प्रदर्शन करता है।'
​अखंड व्रत ही साधुत्व की शक्ति : ​साधु जीवन की शुचिता पर बल देते हुए आचार्यश्री ने फरमाया कि पांच महाव्रतों का निर्दोष पालन ही साधु को तेजस्वी बनाता है। यदि एक भी महाव्रत खंडित होता है, तो पूरा साधुत्व उसी प्रकार बिखर जाता है जैसे धागा टूटने पर माला के मोती। ऐसे व्रतों का पालन करने वाला साधक देव जगत में भी पूजनीय होता है। त्याग और तप का संकल्प: 'योगक्षेम वर्ष' के अंतर्गत आचार्यश्री ने उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को लाडनूं प्रवास तक विशेष संकल्प दिलाए: नवकारसी तप: सूर्योदय के पश्चात निश्चित समय तक अन्न-जल का त्याग। जमीकंद त्याग: आलू, प्याज, लहसुन, गाजर और मूली जैसे अभक्ष्य पदार्थों का पूर्ण त्याग। रात्रि भोजन त्याग: संयमित जीवन शैली के लिए रात्रि भोजन का परित्याग। ​वैश्विक शांति के लिए बड़ी पहल : जैन विश्व भारती संस्थान के कुलपति बच्छराज दूगड़ ने जानकारी दी कि आचार्यश्री की प्रेरणा से संस्थान ने युद्धरत देशों के राष्ट्राध्यक्षों को राजदूतों के माध्यम से ई-मेल भेजकर शांति की अपील की है। अहिंसा और समाधान की इस पहल की सर्वत्र सराहना की जा रही है।