गुरुवाणी/ केन्द्र
कष्टों और प्रतिकूलताओं में समता भाव ही सच्ची निर्जरा : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने लाडनूं स्थित जैन विश्व भारती के पावन प्रांगण में श्रद्धालुओं को धैर्य और आत्म-विजय का मार्ग दिखाया।
‘उत्तरज्झयणाणि आगम’ के माध्यम से अमृत देशना प्रदान करते हुए आचार्य प्रवर ने स्पष्ट किया कि जीवन में आने वाले कष्ट और 'परीषह' (कष्ट सहिष्णुता) आध्यात्मिक प्रगति के सोपान हैं।
अहिंसा की साधना में ‘परीषह’ का महत्व : आचार्यश्री ने प्रवचन में फरमाया कि साधु जीवन में अहिंसा की चेतना के साथ-साथ कष्ट सहिष्णुता का मनोभाव होना अनिवार्य है। उन्होंने आगम में वर्णित 22 परीषहों का उल्लेख करते हुए फरमाया— 'चाहे भूख-प्यास हो या शीत-ताप जैसी प्राकृतिक प्रतिकूलताएं, साधु को अपने मनोबल से इन्हें समता भाव के साथ सहना चाहिए। वर्षा आए या रुके, गर्मी की लू चले या न चले, साधक को कभी अधीर नहीं होना चाहिए।'आचार्यश्री ने प्रेरणा दी कि जब भी प्रतिकूल परिस्थिति आए, तो नारकीय जीवों की असहाय वेदना का चिंतन कर स्वयं के कष्टों को कर्म निर्जरा का अवसर मानना चाहिए।
व्यावहारिक जीवन का मंत्र : श्रेष्ठ कार्यों से दें निंदा का उत्तर : आध्यात्मिक और व्यावहारिक जीवन में सामंजस्य बिठाते हुए आचार्यश्री ने फरमाया कि केवल शारीरिक स्वस्थता ही पर्याप्त नहीं, चित्त की प्रसन्नता और मनोबल भी अनिवार्य है। उन्होंने फरमाया कि यदि कोई निंदा करे या अपमान का प्रसंग आए, तो वाणी का संयम रखते हुए अपने श्रेष्ठ कार्यों से स्तरीय आलोचना का उत्तर देना चाहिए।
गृहस्थों को संदेश देते हुए उन्होंने फरमाया कि आर्थिक या स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में विलाप करने के बजाय जप, तप और स्वाध्याय से परिस्थितियों का सामना करें।
मुनि पारसकुमारजी ने रचा नया कीर्तिमान : इस अवसर पर धर्मसंघ में एक गौरवशाली अध्याय जुड़ा, जब मुनि पारसकुमारजी ने पूज्य गुरुदेव
की सन्निधि में 53 दिन की निराहार तपस्या का प्रत्याख्यान किया। तेरापंथ धर्मसंघ के इतिहास में इसे एक बड़ी उपलब्धि और कीर्तिमान के रूप में देखा जा रहा है।
केश लुंचन : स्वाध्याय की प्रेरणा
पूज्य आचार्यश्री के मुखारविंद और मस्तक के केश लुंचन का विशेष प्रसंग रहा। चतुर्विध धर्मसंघ ने आचार्य प्रवर के प्रति वंदना निवेदित कर उनकी सुख-साता पूछी।
इस निर्जरा के उपलक्ष्य में आचार्यश्री ने समस्त साधु-साध्वियों और समणियों को एक-एक घंटा आगम स्वाध्याय करने की प्रेरणा प्रदान की।
गीत प्रस्तुति: साध्वी प्रेमलताजी एवं साध्वी समन्वयप्रभाजी द्वारा।