शिष्य वही, जो गुरु के बोले बिना उनके मनोभावों को समझ ले :आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 24 मार्च, 2026

शिष्य वही, जो गुरु के बोले बिना उनके मनोभावों को समझ ले :आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने लाडनूं स्थित सुधर्मा सभा में चतुर्विध धर्मसंघ को संबोधित किया। वर्तमान में 'उत्तरज्झयणाणि' आगम के प्रथम अध्ययन ‘विणयसुत्तं’ पर व्याख्यान देते हुए आचार्यश्री ने गुरु-शिष्य संबंधों की प्रगाढ़ता और विनय परंपरा के सूक्ष्म सूत्रों को रेखांकित किया।
शब्दों से परे 'इंगित' को समझना ही शिष्यत्व : आचार्यश्री ने फरमाया कि एक सुविनीत और कुशल शिष्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह गुरु की वाणी के साथ-साथ उनके मन की इच्छा को भी समझ ले। उन्होंने कहा, 'यदि शिष्य बिना कहे गुरु के भीतरी भावों और इंगित को समझ लेता है, तो यह उसकी विशिष्टता है। यदि कभी असमंजस हो, तो शिष्य को उचित अवसर देखकर विनम्रतापूर्वक गुरु से मार्गदर्शन मांग लेना चाहिए।'
आज्ञा का पालन और समयबद्धता: प्रवचन के दौरान पूज्य प्रवर ने गुरु की आज्ञा को 'तहत' (शिरोधार्य) कहकर स्वीकार करने पर बल दिया। उन्होंने फरमाया कि शिष्य केवल सुनकर ही न रह जाए, बल्कि उसे अपने आचरण और कर्म में पूर्णतः परिणत करे।
निष्ठा : गुरु द्वारा सौंपे गए कार्य को पूरी तन्मयता से पूर्ण करना।
समय प्रबंधन : कार्य को नियत समय से पूर्व संपन्न कर आचार्य को सूचित करना एक आदर्श शिष्य का लक्षण है।
मैनेजमेंट के सूत्र : समर्पण और अनुभव का मेल
धर्मसंघ में कुशल प्रबंधन (Management) की चर्चा करते हुए आचार्यश्री ने महत्वपूर्ण बिंदु साझा किए:
1.सतत निगरानी: संगठन के मुखिया को सौंपे गए कार्यों की समय-समय पर प्रगति (प्रोग्रेस) पूछनी चाहिए ताकि कार्य में गति बनी रहे।
2.समर्पण ही श्रेष्ठ सेवा: जो शिष्य अपने दायित्वों के प्रति पूर्ण समर्पित रहते हैं, वे ही संघ की सबसे बड़ी सेवा करते हैं।
वृद्ध साधुओं का योगदान: आचार्यश्री ने स्पष्ट किया कि जिनकी आयु अधिक है या स्वास्थ्य अनुकूल नहीं है, वे भी अपने अनुभव और सूक्ष्म चिंतन से संघ को सही दिशा देकर महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
'हमारे धर्मसंघ में विनय की परंपरा अत्यंत उन्नत है, जहां शिष्य गुरु के भावों को क्रियान्वित करने के लिए सदैव तत्पर रहता है।