गुरुवाणी/ केन्द्र
विनय से महकता है व्यक्तित्व, व्यवहार में लाएं सौंदर्य और माधुर्य :आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने लाडनूं की पावन धरा पर 'उत्तरज्झयणाणि' आगम के माध्यम से मानवता के कल्याण हेतु पावन पाथेय प्रदान किया। आचार्यश्री ने जीवन में 'विनय' और 'व्यवहार कुशलता' को सफलता का मूल मंत्र बताया।
विनय से ही प्रशस्त बनता है व्यवहार : श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए आचार्यश्री ने फरमाया कि व्यवहार कौशल का सबसे महत्त्वपूर्ण सूत्र विनय है। विनय न केवल व्यक्ति के व्यवहार को निखारता है, बल्कि चित्त समाधि की दृष्टि से भी इसका अत्यधिक महत्त्व है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सामुदायिक जीवन में, जहाँ अनेक व्यक्ति एक व्यवस्था से जुड़े होते हैं, वहाँ पारस्परिक व्यवहार में विनय होने से ही सौन्दर्य, माधुर्य और गांभीर्य का संचार होता है।
वाणी का संयम और माधुर्य आवश्यक : आचार्यश्री ने बाह्य सुंदरता की तुलना में आंतरिक और व्यावहारिक सुंदरता पर बल देते हुए कहा:
सौन्दर्य : उच्छृंखलता और अमर्यादित भाषा व्यवहार की सुंदरता को नष्ट कर देती है।
माधुर्य : मिष्ठ और शालीन भाषा के प्रयोग से ही जीवन में माधुर्य का दर्शन संभव है।
गांभीर्य : व्यवहार में गहराई साधना की तीव्रता से आती है। जैसे सागर में गहराई और पर्वत में उच्चता होती है, वैसे ही एक मनस्वी व्यक्ति के व्यक्तित्व में ये दोनों गुण समाहित होने चाहिए।
जल्दबाजी और आवेश में न लें निर्णय : आचार्य प्रवर ने समाज और संगठन के उत्तरदायी व्यक्तियों को सजग करते हुए फरमाया कि किसी भी निर्णय में आवेश, उतावलेपन या भावुकता का स्थान नहीं होना चाहिए। ज्ञान की गहराई के लिए आगमों और दार्शनिक ग्रंथों का अध्ययन आवश्यक है। एक मेधावी और विनीत शिष्य, जो विनय पद्धति के प्रति समर्पित होता है, उसकी कीर्ति पूरे लोक में फैलती है और वह अन्य प्राणियों के लिए आधारभूत शरण स्थल बन जाता है।
शासन गौरव साध्वी राजीमतिजी का गुरुकुल वास :
प्रवचन के उपरांत नोखा प्रवास संपन्न कर 'शासन गौरव' साध्वी राजीमतिजी योगक्षेम वर्ष के संदर्भ में गुरुकुल वास में पहुंचीं। उन्होंने अभिवंदना के साथ अपने भावों की सुंदर अभिव्यक्ति दी। इस अवसर पर उनके साथ सहवर्ती साध्वियों ने मधुर गीत का संगान किया। नोखा से आए बड़ी संख्या में श्रावकों ने भी अपने वक्तव्य और गीतिका के माध्यम से गुरु चरणों में श्रद्धा निवेदित की।