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267वें आचार्य भिक्षु अभिनिष्क्रमण दिवस पर विविध आयोजन
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य प्रवर्तक आचार्य श्री भिक्षु का 267 वां अभिनिष्क्रमण दिवस शुक्रवार को बीकानेर और गंगाशहर में अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। तेरापंथ समाज के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पर्व है, जो त्याग और सत्य क्रांति के प्रतीक के रूप में पहचाना जाता है। अध्यात्म और क्रांति का संगम गंगाशहर स्थित बोथरा भवन में आयोजित मुख्य कार्यक्रम में मुनि अमृत कुमार जी ने आचार्य भिक्षु के जीवन दर्शन पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि आज ही के दिन (विक्रम संवत 1817 की चैत्र शुक्ला नवमी) स्वामी जी ने शिथिलाचार को त्याग कर सत्य की खोज में आचार्य रघुनाथ जी के संघ से 'अभिनिष्क्रमण' किया था। उनकी इसी वैचारिक क्रांति ने 'तेरापंथ' जैसे अनुशासित और संगठित धर्मसंघ की नींव रखी। आचार्य भिक्षु अभिनिष्क्रमण दिवस पर फरमाते हुए मुनि अमृत कुमार जी ने कहा कि तेरापंथ आचार्य भिक्षु की तपस्या का फल है। राम नवमी और आचार्य भिक्षु अभिनिष्क्रमण दिवस राम और आचार्य भिक्षु में बहुत समानताएं है राम ने कितने कष्ट सहन किये 14 वर्षों का वनवास काटा वैसे ही आचार्य भिक्षु ने अनेकों कष्ट सहन किये। संघर्षों को न्योता देकर तेरापंथ बनाया। उन्होंने कहा कि तेरापंथ का नामकरण भी किसी और ने दिया। शमशान में वास किया। बगड़ी में किसी ने जगह नहीं दी। शमशान में अभय की साधना की। हाटों में प्रवास किया दुकानों में चातुर्मास किया सड़को पर प्रवचन दिया। ऐसे अनेकों कष्ट सहन किये। जब रघुनाथ ने कहा कि आगो थारो पीछो म्हारो तब आचार्य भिक्षु ने कहा कि अब मुझे और क्या चाहिए जब गुरू मेरे पीछे है तो अब मुझे क्या डर।
आचार्य भिक्षु किसी से नहीं डरे। हमें सिर्फ तेरापंथ का नाम या आचार्य भि़क्षु का नाम लेने से नहीं चलेगा उनके सिद्धान्तों को समझना होगा उन्हे क्रियान्वित करना होगा। तेरापंथ धर्मसंघ की मजबूती का मुख्य आधार कार्यक्रम में उपस्थित मुनि विमल विहारी जी , मुनि प्रबोध मुनि जी , मुनि उपशम जी और विद्वानों ने कहा कि आचार्य भिक्षु केवल एक संप्रदाय के प्रवर्तक नहीं थे, बल्कि वे एक महान समाज सुधारक और तत्वज्ञान के मर्मज्ञ थे। उन्होंने 'एक गुरु, एक विधान' का जो मार्ग दिखाया, वह आज भी तेरापंथ धर्मसंघ की मजबूती का मुख्य आधार है। मुनि प्रबोध कुमार जी ने मंगलभावनाओं का संगान किया।
राजनगर के श्रावक ही भिक्षुस्वामी के अभिनिष्क्रमण के निमित बने। तेरापंथी महासभा के संरक्षक जैन लूणकरण छाजेड़ ने कहा कि राजनगर के श्रावक ही भिक्षुस्वामी के अभिनिष्क्रमण के निमित बने। आचार्य भिक्षु ने सत्य व आगमों में वर्णित जैन सिद्धांतों व जैन जीवनशैली के लिए क्रान्ति की जिसका ही फल तेरापंथ के रूप में सामने आया। उन्होंने कहा भिक्षु स्वामी ने युग के अनुरुप निर्णय लेने की व्यवस्था अपने द्वारा लिखित मर्यादावली में कही जिसके कारण आचार्य भिक्षु के बाद 10 आचार्यों ने तेरापंथ को नयी उंचाईयों तक पहुंचाया है। उपासिका कनक देवी गोलछा ने भी अपने विचार रखते हुए आचार्य भिक्षु को भावांजलि अर्पित की। समारोह में सभी उपस्थितजनों ने सामायिक करके आचार्य भिक्षु को भावांजलि अर्पित की।