स्वाध्याय
धर्म है उत्कृष्ट मंगल
स्त्री को भी मोक्ष का अधिकार है
श्वेताम्बर जैन परम्परा का यह स्पष्ट मत है कि स्त्री भी मोक्ष प्राप्त कर सकती है। दिगम्बर मतानुसार स्त्री मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकती। कालू यशोविलास के चौथे उल्लास की चौथी गीतिका में उल्लेख है कि पूज्य कालूगणी एक बार कालू (मारवाड़ का एक कस्बा) पधारे। मध्याहन-कालीन प्रवचन में गुरुवर ने कहा- नारी भी मुक्ति प्राप्त कर सकती है। यह सुन प्रवचन में उपस्थित दिगम्बर-परम्परा के अनुयायी जैन श्रावक चौंके। पूज्य आचार्यश्री ने दिगम्बर ग्रन्थ के आधार पर स्त्री का मोक्ष गमन सिद्ध किया। उन्होंने गोम्मटसार जीवकाण्ड की यायात्रयी प्रस्तुत की।
गणिवर गोम्मटसार जो, मान्य दिगम्बर ग्रन्थ,
साक्षि-रूप रख सामने, वर्णवियो विरतंत।।
जीवकाण्ड सुविचार में, गाथा-त्रयी अवीण।
श्रपकश्रेणि विवरण-वरण, देखो प्रगट प्रवीण।
पुरुष-वेद, स्त्री-वेद-युत, अरु जो कृत्रिम क्लीव।
एक समय में खपक लै, एता-एता जीव।
अप्रतिपाती है सदा क्षपक-श्रेणि को बाट।
तो ललना जनहित-जड्यो, क्यूं शिवगमन-कपाट?।।
(का. ४/४/८-११)
कालूयशोविलास का तत्त्व निरूपण विशाल एवं वैविध्यपूर्ण है। उसका संक्षिप्त निदर्शन प्रस्तुत निबंध में किया गया है।
तेरापथ में आचार्य पदारोहण : एक पर्यवेक्षण
सत्य के प्रति अपना सम्पूर्ण समर्पण करने वाला व्यक्ति सत्य का साक्षात्कार कर सकता है। परन्तु वह समर्पण कुछ ही व्यक्तियों में हो सकता है, सब में संभव नहीं है। आचार्य भिक्षु जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के प्रवर्तक एवं प्रथम आचार्य थे। वे तपस्वी, क्रांतिकारी और सत्यसंधित्सु थे, ऐसा इतिहास पढ़ने से ज्ञात होता है। उन्होंने स्वप्रवर्तित संघ की सुव्यवस्था एवं शुद्ध संयम-आराधना के लिए अनेक मर्यादाओं का निर्माण किया। उन मर्यादाओं को तेरापंथ का हृदय कहा जा सकता है।
तेरापंथ के संविधान के अनुसार धर्मसंघ में एक ही आचार्य होता है। वर्तमान आचार्य भावी आचार्य का मनोनयन करता है। मनोनयन का प्रकटीकरण दो तरीकों से किया जाता रहा है। पहला तरीका है अपने जीवनकाल में ही भावी आचार्य की खुली घोषणा कर देना। दूसरा तरीका है भावी आचार्य का निर्णय प्रच्छन्न पत्र में लिखित रूप में छोड़ देना। इन दोनों विधियों का उपयोग हमारे धर्मसंघ के पूर्व आचार्यों ने किया है, इतिहास इसका साक्ष्य है।
धर्मसंघ के प्रथम पांच आचार्य एवं अष्टम आचार्य श्री कालूगणी ने अपने भावी आचार्य का मनोनयन खुली घोषणा के माध्यम से किया, अपने जीवनकाल में ही अपना युवाचार्य स्थापित कर दिया। सप्तम आचार्य श्री डालगणी ने अपने जीवनकाल में अपने भावी आचार्य की घोषणा नहीं की, उनके देहावसान के बाद प्रच्छन्न पत्र में लिखित मनोनयन के आधार पर श्री कालूगणी आठवें आचार्य बने। सात आचार्यो के मनोनयन का यह अति संक्षिप्त इतिहास है। अब तक हुए तेरापंथ के दस आचार्यो में से तीन आचार्यो का आचार्य-पदारोहण ऊपरलिखित द्विविध सामान्य परम्परा से भिन्न प्रकार हुआ है।
प्रथम आचार्य श्री भिक्षु किसी पूर्व आचार्य के द्वारा घोषित और मनोनीत आचार्य नहीं थे। वे किसी आचार्य के उत्तराधिकारी नहीं थे, तीर्थकर महावीर के परम्परित उत्तराधिकारी उन्हें कहा जा सकता है। वे स्वयं तेरापंथ के संस्थापक एवं प्रवर्तक थे, अतः किसी पूर्व आचार्य के घोषित-मनोनीत उत्तराधिकारी वे हो भी नहीं सकते थे। उनकी निःस्पृहता, प्रबल वैराग्य, प्रज्ञा और सक्षमता ने उनको सहज रूप से आचार्य बना दिया, वे संघमान्य आचार्य हो गए।
सप्तम आचार्य श्री डालगणी अपने पूर्व आचार्य श्री माणकगणी द्वारा घोषित अथवा प्रच्छन्न पत्र में लिखित मनोनयन के आधार पर संस्थापित आचार्य नहीं थे। सात्त्विक दुःख और सुख की बात यह है कि डालगणी से पूर्व कुछ महीने संघ को संघपतिरहित रहना पड़ा और फिर गरिमापूर्ण तरीके से डालगणी का आचार्य के रूप में निर्वाचन हुआ। घटना की संक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है-