स्वाध्याय
श्रमण महावीर
'क्या यह एक पल में ही घटित हो जाता है?'
'भन्ते ! दीप का बुझना और अंधकार का होना एक ही घटना है। इसमें अंतराल नहीं है।'
'गौतम! मैं यही कहता हूं कि जागरण का दीप जिस क्षण बुझता है, उसी क्षण चित्तभूमि में अन्धकार छा जाता है।'
'भन्ते! जागरण के क्षण में क्या होता है?'
'अंधकार प्रकाश में बदल जाता है।'
'भन्ते ! क्या मनुष्य का कृत बदलता है?'
'मनुष्य जागरण के क्षण में होता है तब चित्त आलोकित हो उठता है। साथ-साथ पुण्य के संस्कार प्रबल होकर पाप के परमाणुओं को पुण्य में बदल डालते हैं। यह है पाप का पुण्य में संक्रमण। यह है कृत का परिवर्तन ।'
'भंते! प्रमाद के क्षण में क्या होता है?'
'प्रमाद के क्षण में मनुष्य का चित्त अन्धकार से आच्छन्न हो जाता है। साथ-साथ पाप के संस्कार प्रबल होकर पुण्य के परमाणुओं को पाप में बदल डालते हैं। यह है पुण्य का पाप में संक्रमण। यह है कृत का परिवर्तन।'
'भन्ते! यह बहुत ही आश्चर्यकारी घटना है। यह कैसे सम्भव हो सकती है?'
'यह संभव है। इसी में हमारे पराक्रम की सार्थकता है। यह हमारे पुरुषार्थ की नियति है। इसे कोई टाल नहीं सकता। इसलिए मैं कहता हूं-यह अप्रमाद की ज्योति को अखंड रहने दो। ध्यान रखो, यह पलभर के लिए भी बुझ न पाए।'
चक्षुदान
भगवान ज्योतिपुंज थे। उनके सम्पर्क में आ नए-नए दीप प्रज्वलित हो रहे थे और बुझते दीप फिर ज्योति प्राप्त कर रहे थे।
दीप का जलना और बुझना सामान्य प्रकृति है। भगवान इसे पसन्द नहीं करते थे। उनकी भावना थी कि चेतना का दीप जले, फिर बुझे नहीं। वह सतत जलता रहे और जलते-जलते उस बिन्दु पर पहुंच जाए, जहां बुझने की भाषा ही नहीं है।
मेघकुमार सम्राट् श्रेणिक का पुत्र था। वह भगवान की सन्निधि में गया। उसकी सुप्त चेतना जाग उठी। उसकी चेतना का प्रवाह ऊर्ध्वमुखी हो गया। ढक्कन से ढका हुआ दीप हजारो-हजारों विवरणों से ज्योति विकीर्ण करने लगा। वह सतत प्रज्वलित रहने की दिशा में प्रस्तुत हुआ। हमारी भाषा में मुनि बन गया।
दिन जागृति में बीता। रात नींद में। आखों में नीद नहीं आई। वह चेतना के दीप पर छा गई। चक्षु-दीप पर छाने वाली नींद सूर्योदय के साथ टूट जाती है। पर चेतना के दीप पर छा जाने वाली नींद नहीं टूटती है-हजारों-हजारों दिन आने पर भी और हजारों-हजारों सूर्योदय हो जाने पर भी। नींद के क्षणों में मेघकुमार की चेतना का प्रवाह अधोमुखी हो गया। वह भगवान के पास आया। भगवान ने देखा, उसका चेतना-दीप बुझ रहा है। भगवान बोले- 'मेघ! तुम अपनी जागृत चेतना को लौटाने मेरे पास आए हो। क्यों, यह सही है न?'
'भंते ! कुछ ऐसा ही है।'
'मेघ ! तुम्हारी स्मृति खो रही है। तुम हाथी के जन्म में जागृति की दिशा में बढ़े थे और अब मनुष्य होकर, मगध सम्राट के पुत्र होकर, सुषुप्ति की दिशा में जाना चाहते हो, क्या तुम्हारे लिए उचित होगा?'
भगवान की बात सुन मेघकुमार का मानस आन्दोलित हो गया। वह चित्त की गहराइयों में खो गया। उसे कुछ विलक्षण-सा अनुभव होने लगा। ऐसा होना जरूरी था। उसके मानस को आश्चर्य में डाले बिना, आन्दोलित किए बिना, उसे मोड़ देना संभव नहीं था। चेतना जागरण के रहस्यों को जानने वाले ऐसा कर व्यक्ति को खोज की यात्रा में प्रस्थित कर देते हैं। मेघकुमार प्रस्तुत को भूल गया। जो बात भगवान को कहने आया था, वह उसके हाथ से छूट गई। उसके मन में जिज्ञासा के नए अंकुर फूट पड़े। उसकी भीतरी खोज आरम्भ हो गई। उसके मानवीय पर्याय पर हाथी का पर्याय आरोहण कर गया।