संबोधि

स्वाध्याय

आचार्यश्री महाप्रज्ञ

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मुमुक्षा के साथ-साथ स्वस्थ शरीर की आवश्यकता है। 'नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः' - दुर्बल व्यक्ति आत्मा को उपलब्ध नहीं हो सकता। महावीर ने कहा है- 'सरीरमाहु नाव त्ति'- संसार सागर को पार करना है तो जीर्ण-शीर्ण नौका से काम नहीं चल सकता। नाव मजबूत चाहिए। शरीर नाव है। जितेन्द्रियता, शान्तचित्तता, स्थिरासन, मनोजयत्व आदि गुण भी ध्याता के लिए अनिवार्य है।
गृहस्थ या मुनि, कोई भी व्यक्ति हो यदि उपरोक्त गुणों से सम्पन्न न हो तो ध्यान का मार्ग उसके लिए अशक्य है। स्वामी रामकृष्ण ने अपने गहरे अनुभवों से कहा है-गृहस्थ में रहते हुए ईश्वर की प्राप्ति करना कठिन है। ईश्वर की प्राप्ति के बाद कहीं भी रहा जा सकता है, कोई कठिनाई पैदा नहीं होती। प्रारंभ में तो समय-समय पर महीने, दो महीने, छह महीने, वर्षभर उसे सर्वथा गृहस्थ जीवन से मुक्त होकर एकांत में तीव्र भावना के साथ ईश्वर को पुकारना चाहिए।
जीसस ने कहा है-'द्वार खटखटाओ, अवश्य खुलेगा।' 'ईश्वर पुकार सुनेगा। आचार्य शुभचंद्र ने गृहस्थ जीवन में विशिष्ट ध्यान की संभाव्यता का बड़े सचोट शब्दों में निषेध किया है। वे कहते हैं- 'आकाश में पुष्प और गधे के सींग की किसी तरह संभाव्यता स्वीकार की जा सकती है, किन्तु गृहस्थाश्रम में ध्यान की सिद्धि किसी भी देश तथा काल में संभव नहीं है।' इसके अनेक कारण प्रस्तुत किए हैं-
(१) सतत स्त्रियों का सम्पर्क रहता है।
(२) व्यक्ति इन्द्रिय विषयों में वर्तता है।
(३) आजीविका आदि की चिंता रहती है।
(४) प्रमाद-जागरूकता का अभाव है।
(५) मोह-ममत्व से घिरा रहता है।
(६) जीवन क्लेश और कष्ट-बहुल होता है।