गुरुवाणी/ केन्द्र
सत्य महाव्रत आत्मिक शांति का मार्ग, अल्पभाषी बनकर करें इसकी रक्षा : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता एवं युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने लाडनूं की पावन धरा पर 'उत्तरज्झयणाणि' आगम के माध्यम से सत्य की महत्ता प्रतिपादित की। उन्होंने फरमाया कि जिस प्रकार संसार में जल और अन्न को रत्न माना गया है, उसी प्रकार अध्यात्म की दुनिया में साधु के पाँच महाव्रत पाँच अमूल्य रत्नों के समान हैं, जिनकी सुरक्षा करना हर साधक का परम कर्तव्य है।
सत्य महाव्रत : केवल सच नहीं, विवेक भी जरूरी :
आचार्यश्री ने दूसरे महाव्रत 'सत्य' पर प्रकाश डालते हुए फरमाया कि सत्य महाव्रत वास्तव में मृषावाद (झूठ) का पूर्ण त्याग है। उन्होंने एक सूक्ष्म बिंदु की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि केवल सच बोलना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह विवेक रखना भी जरूरी है कि कौन सा सत्य बोलने योग्य है। साधु को सदैव चिंतन पूर्वक और कल्याणकारी सत्य ही बोलना चाहिए।
सत्य की साधना के तीन मुख्य सूत्र: गुरुदेव ने प्रवचन के दौरान सत्य को अक्षुण्ण रखने के लिए व्यावहारिक समाधान दिए:
अल्पभाषिता: अधिक बोलने से अनजाने में भी असत्य की संभावना बढ़ जाती है। अतः मितभाषी बनना सत्य की आराधना में सहायक है।
विकारों पर नियंत्रण: क्रोध, लोभ, भय और यहाँ तक कि अत्यधिक हास्य के वशीभूत होकर व्यक्ति झूठ बोल देता है। साधु को हास्य में भी असत्य से बचना चाहिए।
प्रायश्चित की शुद्धि: यदि प्रमादवश मुख से कोई असत्य निकल जाए, तो तत्काल प्रायश्चित द्वारा आत्म-शुद्धि कर लेनी चाहिए।
गृहस्थों के लिए सत्य-अणुव्रत की प्रेरणा:
आचार्यश्री ने फरमाया कि जहाँ साधुओं के लिए पूर्ण त्याग का 'महाव्रत' है, वहीं गृहस्थों को 'सत्य-अणुव्रत' का पालन करना चाहिए। यदि समाज का हर व्यक्ति निष्ठापूर्वक सत्य की ओर कदम बढ़ाए, तो संपूर्ण विश्व में नैतिकता और शांति का संचार हो सकता है।
संयम की हाजरी और भावाभिव्यक्ति:
चतुर्दशी के विशेष अवसर पर आचार्यश्री ने सभी चारित्रात्माओं को पाँच महाव्रत, पाँच समिति और तीन गुप्ति के पालन हेतु प्रेरित किया। उपस्थित साधु-साध्वियों ने अपने स्थान पर खड़े होकर पूरी निष्ठा के साथ 'लेख-पत्र' का उच्चारण किया।
कार्यक्रम में ह्यूस्टन सेंटर (USA) से आईं समणी आर्जव प्रज्ञाजी और साध्वी उज्ज्वल रेखाजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। साध्वीवृंद द्वारा सुमधुर गीतों का संगान भी किया गया, जिस पर पूज्य प्रवर ने अपना मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।