जहाँ सरलता और शुद्धि, वहीं होता है धर्म का निवास : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 5 अप्रैल, 2026

जहाँ सरलता और शुद्धि, वहीं होता है धर्म का निवास : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखंड परिव्राजक एवं युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने लाडनूं की पावन धरा पर 'धर्म का निवास कहां?' विषय पर प्रेरक उद्बोधन दिया। आचार्यश्री ने स्पष्ट किया कि मोक्ष की प्राप्ति केवल उन्हीं को संभव है, जिनके जीवन में धर्म स्थिर होता है और धर्म केवल सरल हृदय में ही निवास करता है।
साधन की महत्ता सिद्धि तक :
मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में पूज्य प्रवर ने फरमाया कि शास्त्रों में वर्णित चारित्र, संवर और निर्जरा जैसे तत्व मोक्ष प्राप्ति के साधन हैं। सिद्धि (मोक्ष) प्राप्त होने के बाद इन साधनों का महत्व स्वतः समाप्त हो जाता है, क्योंकि सिद्ध आत्माएं कृतकृत्य हो जाती हैं। उन्होंने कहा, "साधनों की सार्थकता साध्य (लक्ष्य) तक पहुंचने तक ही है।"
सरलता ही शुद्धि का आधार :
आगम वाणी का उल्लेख करते हुए आचार्यश्री ने धर्म के निवास की एक वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने तीन महत्वपूर्ण प्रश्नों के माध्यम से सूत्र दिया:
1.धर्म कहां ठहरता है? - शुद्ध आत्मा में।
2.शुद्ध कौन होता है? - जो ऋजु (सरल) होता है।
3.पात्रता क्या है? - निश्छलता और सरलता। आचार्यश्री ने फरमाया, "जहाँ ऋजुता होती है, वहीं शुद्धि होती है। जो व्यक्ति भीतर से सरल है, वही धर्म को धारण करने का पात्र है।
दोषों को स्वीकार करना ही प्रायश्चित:
साधु जीवन का उदाहरण देते हुए आचार्यश्री ने सचेत किया कि यदि जीवन में सरलता नहीं है, तो अनजाने में परिग्रह, चोरी और हिंसा जैसे दोष लग सकते हैं। उन्होंने कहा कि एक साधु को बालक की भांति निश्छल होना चाहिए। जिस प्रकार बालक माता-पिता के सामने सब कुछ सच कह देता है, वैसे ही साधु को अपने दोषों को गुरु के समक्ष विनम्रता से स्वीकार कर लेना चाहिए। बिना स्वीकारोक्ति के प्रायश्चित संभव नहीं और बिना प्रायश्चित के शुद्धि संभव नहीं।
संग्रह नहीं, शोधन करें :
छद्मस्थ अवस्था में गलतियां होना स्वाभाविक है, लेकिन आचार्यश्री ने सीख दी कि दोषों को इकट्ठा नहीं करना चाहिए। जैसे ही भूल हो, उसका तत्काल प्रायश्चित कर आत्म-शोधन करना चाहिए। प्रवचन के पश्चात पूज्य गुरुदेव ने उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया और सामूहिक ध्यान का प्रयोग करवाया।