सफलता के लिए स्वच्छंदता का त्याग व अनुशासन  अनिवार्य : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 8 अप्रैल, 2026

सफलता के लिए स्वच्छंदता का त्याग व अनुशासन अनिवार्य : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में 'योगक्षेम' के कार्यक्रम पूरी दिव्यता के साथ गतिमान हैं। सुधर्मा सभा में ‘स्वच्छंदता का निरोध करें’ विषय पर अपनी ओजस्वी देशना देते हुए शांतिदूत ने फरमाया कि जीवन में अनुशासन ही वह कवच है जो व्यक्ति को पतन से बचाकर सफलता के शिखर तक ले जाता है।
सामुदायिक जीवन में अनुशासन की महत्ता :
आचार्य प्रवर ने 'अनुशासनबद्धता' और 'स्वच्छंदता' के बीच के सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करते हुए फरमाया कि कई बार व्यक्ति के मन में यह विचार आता है कि वह दूसरों के नियंत्रण में क्यों रहे? उन्होंने मार्गदर्शन दिया कि यदि साधना इतनी उच्च कोटि की हो कि व्यक्ति 'स्वानुशासी' बन जाए और उसके कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ) अत्यंत मंद पड़ जाएं, तब तो पर-अनुशासन की आवश्यकता नहीं रहती। परंतु, एक स्वस्थ सामुदायिक जीवन के लिए अनुशासन में रहना अनिवार्य है।
आगम का उदाहरण : प्रशिक्षित अश्व और साधु :
आगमों के गूढ़ रहस्यों को सरल भाषा में समझाते हुए आचार्य श्री ने फरमाया—
"जिस प्रकार एक सुरक्षा कवच (तनु त्राण) से सुसज्जित और भली-भांति प्रशिक्षित अश्व ही रणक्षेत्र में विजय प्राप्त कर सकता है, उसी प्रकार अपनी स्वच्छंद प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने वाला साधु ही संसार सागर को पार कर मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है।"
विनय से ही सर्वांगीण विकास :
आचार्य श्री ने जोर देकर कहा कि चाहे गृहस्थ हो या साधु, कल्याण का मार्ग अनुशासन से ही प्रशस्त होता है। जो व्यक्ति जीवन के शुरुआती दौर से ही प्रमाद (आलस्य) का त्याग कर बड़ों के प्रति 'विनय' का भाव रखता है और उनके निर्देशों में शिक्षित होता है, उसका सर्वांगीण विकास सुनिश्चित है। इसके विपरीत, स्वच्छंदता का मार्ग केवल विफलता की ओर ले जाता है।
कार्यक्रम की मुख्य झलकियाँ:
प्रारंभ: आचार्य श्री के ओजस्वी मंगल महामंत्रोच्चार से कार्यक्रम की शुरुआत हुई।
प्रज्ञा गीत: साध्वी वृन्द ने मधुर स्वर में प्रज्ञा गीत की प्रस्तुति दी।
ध्यान प्रयोग: प्रवचन से पूर्व आचार्य श्री ने पूरे धर्मसंघ को कुछ समय तक गहन ध्यान का अभ्यास करवाया।
जिज्ञासा समाधान : प्रवचन के पश्चात चारित्रात्माओं (साधु-साध्वियों) ने अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासाएं रखीं, जिनका आचार्य श्री ने समाधान किया।