पाप कर्मों के उदय काल में बंधु भी छोड़ देते हैं साथ :आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 7 अप्रैल, 2026

पाप कर्मों के उदय काल में बंधु भी छोड़ देते हैं साथ :आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी ने प्रवास स्थल पर आयोजित सुधर्मा सभा में श्रावकों को संबोधित किया। आज का मुख्य प्रवचन कार्यक्रम आचार्य प्रवर के स्वास्थ्य या किन्हीं अपरिहार्य कारणों से सुधर्मा सभा स्थल के बजाय उनके प्रवास स्थल पर ही संपादित हुआ।
​कर्मवाद का फल अटल :
‘बंधुजन का असहयोग’ विषय पर पावन देशना देते हुए शांतिदूत आचार्य श्री ने फरमाया कि धर्म एक महान तत्त्व है और धार्मिक जगत का सबसे बड़ा सिद्धांत कर्मवाद है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कर्म उसी को फल देता है जिसने वह कर्म किया है। कर्ता का कर्म सदैव उसके पीछे चलता है।
स्वार्थ और संसार का यथार्थ :
आचार्य श्री ने मर्मस्पर्शी बात कहते हुए फरमाया कि—
​"संसार में व्यक्ति अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए कभी-कभी चोरी, लूटपाट और हिंसा जैसे पाप कर्म कर बैठता है। लेकिन जब उन पाप कर्मों के वेदन (फल भोगने) का काल आता है, तब वे बंधु-जन जिनके लिए पाप किया गया था, साथ छोड़ देते हैं। दुनिया स्वार्थ के वश चलती है; स्वार्थ सिद्धि तक लोग निकट रहते हैं और कार्य पूर्ण होने पर दूरी बना लेते हैं।"
पुण्य-पाप का लेखा-जोखा :
आचार्य प्रवर ने उपस्थित जनमेदिनी को प्रेरित करते हुए कहा कि मनुष्य को कर्मवाद के सिद्धांत को समझकर हिंसा, झूठ और चोरी जैसे कार्यों से बचना चाहिए। पुण्य का फल सुखद होता है और पाप का दुखद, किंतु दोनों ही स्थितियों में कर्म का भोग व्यक्ति को स्वयं ही करना पड़ता है। अतः जितना संभव हो, धर्म के पथ पर अडिग रहना चाहिए।
अणुव्रत प्रशिक्षण सम्मेलन का समापन :
कार्यक्रम के दौरान अणुव्रत विश्व भारती सोसाइटी द्वारा आयोजित पांच दिवसीय 'अणुव्रत कार्यकर्त्ता प्रशिक्षण सम्मेलन' का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया। सोसाइटी के अध्यक्ष प्रताप सिंह दूगड़ एवं मंत्री मनोज सिंघवी ने सम्मेलन के अनुभवों और आगामी कार्ययोजना पर अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्य श्री ने कार्यकर्ताओं को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।
विशेष आकर्षण :
कार्यक्रम का शुभारंभ मंगल महामंत्र से हुआ।
संतवृंद द्वारा प्रज्ञागीत का सुमधुर संगान किया गया।
आचार्य श्री ने उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को ध्यान का प्रयोग करवाकर आत्मिक शांति का मार्ग दिखाया।
अंत में संत-वृंद की आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का समाधान किया गया।