आत्मा शाश्वत है, कर्मों को भोगे बिना नहीं मिलता छुटकारा :आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 6 अप्रैल, 2026

आत्मा शाश्वत है, कर्मों को भोगे बिना नहीं मिलता छुटकारा :आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखंड परिव्राजक शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने जैन विश्व भारती की 'सुधर्मा सभा' में अध्यात्म और दर्शन की अमृत वर्षा की। 'कर्म से छुटकारा कब?' विषय पर सारगर्भित मंगल प्रवचन फरमाते हुए आचार्यश्री ने फरमाया कि कर्मवाद को समझ लेने से मनुष्य के चित्त में शांति आ सकती है।
आत्मा शाश्वत और अखंड है:
आचार्य प्रवर ने जैन दर्शन के 'आत्मवाद' सिद्धांत की व्याख्या करते हुए फरमाया कि आत्मा और शरीर दो पृथक तत्व हैं। पूज्य प्रवर ने स्पष्ट किया:
"आत्मा शाश्वत है; यह हमेशा थी, है और रहेगी। प्रत्येक आत्मा असंख्य प्रदेशों का एक अखंड पिंड है, जिससे न तो कोई प्रदेश अलग हो सकता है और न ही जुड़ सकता है। आत्मा अछेद्य और अभेद्य है।"
नव तत्त्व: आत्मा और कर्म का संबंध :
आचार्यश्री ने फरमाया कि जीव और अजीव के साथ जब कर्म जुड़ते हैं, तो 'नव तत्त्वों' का निर्माण होता है। उन्होंने इन तत्त्वों को कर्म की प्रक्रिया से जोड़ते हुए समझाया:
पुण्य-पाप: कर्मों का शुभ और अशुभ फल।
आश्रव-संवर: कर्मों के आने का मार्ग और उन्हें रोकने की प्रक्रिया।
निर्जरा: कर्मों को आत्मा से पृथक करना।
बंध-मोक्ष: कर्मों का बंधन और उनसे पूर्ण स्वतंत्रता।
समता से सहें कर्मों का उदय:
जीवन के विश्लेषण पर जोर देते हुए आचार्यश्री ने फरमाया कि हमारे जीवन की वर्तमान परिस्थितियाँ कर्मों के उदय और विलय का प्रतिबिंब हैं। आचार्य श्री ने संदेश दिया कि शास्त्रानुसार बंधे हुए कर्मों को भोगे बिना छुटकारा नहीं मिलता। अतः जीवन में आने वाली किसी भी कठिनाई को कर्मों का योग समझकर शांति और समता से सहन करना चाहिए। कर्मों के वेदन (भोगने) और निर्जरा (तप) द्वारा ही मुक्ति संभव है।
विशेष घोषणा : २० सितम्बर को होगी मुनि व साध्वी दीक्षा :
प्रवचन के उपरांत आध्यात्मिक उत्साह के बीच आचार्यश्री ने एक महत्वपूर्ण घोषणा की। मुमुक्षु बाबूलाल बाफना एवं मुमुक्षु सुमन बाई द्वारा दीक्षा हेतु की गई प्रार्थना को स्वीकार करते हुए आचार्य प्रवर ने उन्हें संयम पथ पर अग्रसर करने की अनुमति प्रदान की।
दीक्षा तिथि: २० सितम्बर २०२६ (भाद्रव शुक्ला नवमी) विकास महोत्सव के पवन अवसर पर होने जा रहे दीक्षा महोत्सव घोषणा से संपूर्ण सुधर्मा सभा 'ॐ अर्हम' के नारों से गुंजायमान हो उठी। कार्यक्रम के अंत में आचार्यश्री ने साधु-साध्वियों की जिज्ञासाओं का समाधान भी किया।