संपादकीय
हमारी संस्कृति, हमारा गौरव और अक्षय तप
'इक्षु रस की एक धार से, खिला आज उपवन सारा,'
'धन्य हुए वे तप के राही, धन्य हुआ जग ये सारा'।
'अक्षय ज्ञान मिले सबको, अक्षय हो शुभ भाव यहाँ,'
'तप की शक्ति से महके, तेरापंथ का हर कोना कोना यहाँ'।।
अक्षय तृतीया का पर्व जैन परंपरा में मात्र एक तिथि नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या और अटूट श्रद्धा का जीवंत प्रतीक है। यह वह पावन दिवस है जो हमें युगों पीछे ले जाकर प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के उस महान त्याग की याद दिलाता है, जहाँ से 'पारणा' और 'दान' की गौरवशाली संस्कृति का बीजारोपण हुआ था।
जैन इतिहास के पन्नों को पलटें तो हम पाते हैं कि भगवान आदिनाथ ने सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए एक वर्ष की लंबी निराहार तपस्या की थी। जब हस्तिनापुर की गलियों में इक्षु रस (गन्ने का रस) से उनका पारणा हुआ, तो वह क्षण इतिहास में अमर हो गया। वह दिन वैशाख शुक्ल तृतीया का था, जिसे आज हम 'अक्षय तृतीया' के रूप में मनाते हैं। "अक्षय" का अर्थ है जिसका कभी क्षय न हो—यानी वह पुण्य जो शाश्वत है।
आज के भौतिकवादी युग में, जहाँ संचय की प्रवृत्ति बढ़ रही है, अक्षय तृतीया का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि 'देने' में जो आनंद है, वह 'पाने' में नहीं है। तेरापंथ धर्मसंघ के हम श्रावक, जो आचार्य श्री के मार्गदर्शन में संयम और अनुशासन की राह पर चल रहे हैं, हमारे लिए यह दिन आत्म-निरीक्षण का भी है। क्या हम अपने संचय को समाज और धर्म की सेवा में लगाने के लिए तत्पर हैं?
वर्षीतप की साधना करने वाले तपस्वियों के लिए यह दिन उनकी आध्यात्मिक विजय का उत्सव है। हज़ारों की संख्या में भाई-बहन कठिन तपस्या के बाद पारणा करते हैं, जो उनके आत्मबल और संयम की पराकाष्ठा है।
तेरापंथ टाइम्स के अक्षय तृतीया विशेषांक के माध्यम से हमारा प्रयास है कि हम भगवान ऋषभदेव के आदर्शों और तेरापंथ की गौरवशाली परंपराओं को हर घर तक पहुँचाएँ। आइए, इस अक्षय तृतीया पर हम केवल भौतिक वस्तुओं का ही नहीं, बल्कि अक्षय ज्ञान, अक्षय चारित्र और अक्षय अहिंसा का संकल्प लें।
शुभकामनाओं सहित,
कार्यकारी संपादक...