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अभिनंदन एक प्रकाश पुंज का अभिनंदन एक ज्ञान दीप का
Best Mother and Best Son
स्त्रीणां शतानि शतशो जनयान्ति पुत्रान्
नान्या सुतं त्वदुयमं जननी प्रसूता
सर्वा दिशो दुधति भानि सहस्त्ररश्मिं
प्राच्चेव दिग जनयति स्फुर दंशुजालम ।।
सैकड़ों स्त्रियां सैकड़ों पुत्रों को जन्म देती हैं पर किसी जननी ने आप जैसे पुत्र रत्न को पैदा नहीं किया। उस मां मरूदेवा का करोड़ पूर्व का आयुष्य था। जो यौगालिक युग में सर्वश्रेष्ठ नारी रत्न कहलाई। कुलकर नाभि एवं मरूदेवा जी के प्रांगण में 14 सपनों के साथ एक युगल का जन्म हुआ। जिसे ऋषभ सुमंगला आभिराम आभिधान मिला।
तीसरे आरे के अंतिम समय में एक वृक्ष के नीचे जिनका जन्म हुआ। इस दृष्टि से ट्री की तरह ऋषभ का जीवन दर्शन बहुआयामी स्वयं शीतलता दायक था। खुले आकाश में जन्म उनकी विशालता व्यापकता का परिचायक था। 14 सपनों के साथ Born Bright Futre का संकेत था।
इक्ष्वाकु वंश- काश्यप गोत्र, स्वर्ण वर्ण-वृषभ चिहन उनकी Golden Qulity के प्रतीक है।
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उनकी प्रबल पुण्याई का प्रमाण है। उस समय किसी का Happy Birthday नहीं मनाया जाता था पर ऋषभ का Happy Birthday Celebaration Ceremony इन्द्र ने देव समूह के साथ सुमेरू पर्वत पर किया। इस समय शादी की परंपरा नही थी। युगल भाई-बहन पति-पत्नी के रूप में परिणत हो जाने पर ऋषभ की शादी सुमंगला एवं सुन्नदा के साथ हुयी। उस समय एक टिव्नस होता पर ऋषभ के 100 पुत्र एवं दो पुत्रियां हुई। 10 कल्पवृक्षों से जीवन की समग्र आवश्यकताएं पूरी होती। धीरे-धीरे कलपवृक्षों से सब अपेक्षाएं पूरी नहीं हो रही थी, तब युगलों में संघर्ष विवाद विगृह का माहौल होने लगा। नाभि कुलकर ने विचार विमर्श के बाद एक नयी प्रणाली प्रारंभ की ऋषभ को राजा बनाया।
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कल्पसूत्र के अनुसार ऋषभ पहले राजा, पहले भिक्षु, पहले भिक्षाचर, पहले केवली, पहले तीर्थकर हुए।
राजा ऋषभ ने असी, मसि, कृषि की सुनियोजित व्यवस्था जन जीवन को सिखायी। उन्होंने शिल्पकला नैपुण्य आदि विभिन्न विधाओं का प्रशिक्षण दिया। ग्राम से नगर शहर की सभ्यता संस्कृति का संस्कार दिया। प्रभु के द्वारा शुभारंभ सृष्टि आज डिजिटल युग मीडिया टेक्नोलोजी के रूप में विकसित हो रही है।
एक बार कुछ किसान आदिम राजा के पास आए। बाबा आपके कहने से हमने बीज बोए। फसल तैयार हो गयी। धान सारा बैल खा जाते है तो हमारी मेहनत व्यर्थ चली जाती है। हम क्या करें हमारा मार्गदर्शन करें। ऋषभ ने कहा तुम बैलों के मुंह पर छोंकी बांध दो। बैलों के मुह पर छींकी बांघकर किसानों ने अपना कार्य किया। फिर बैलों को खाद्य पेय दिया मगर बैल कुछ खा नहीं सके।
ऋषभ ने पूछा- तुमने वह छींकी खोली या नहीं। बाबा! आपने छींकी बांधने के लिए कहा मगर खोलने के लिए नहीं कहा। ऋषभ ने कहा बैलों की छींकी शीघ्रता से खोल दो। राजा ऋषभ के कहने से वह छींकी 12 घड़ी रही। अन्तराय कर्म के कारण ऋषभ को 12 महीने तक आहार पानी का योग नहीं मिला।
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जिनके चरण कमल में लक्ष्मी, नयन कमल में अमृत, कर कमल में आशीर्वाद, मुखकमल में प्रसन्नता हर वक्त रहती। जहां दुनिया पद पैसा प्रतिष्ठान परिवार पुत्र पुत्रियों के लिए दौड़ भाग करती है।
वहां प्रभु ऋषभ Peace Power, Patiene, Positinuty Project को पाने श्रामण्य के राजमार्ग पर बढ़ते रहे। उनमें एक ही राह, एक ही चाह एक ही तमन्ना थी।
अरमानों के आकाश को छूते हैं बुलंद हौसले।
यह बात किसी मस्त कलन्दर ने खेल दी।।
Life is a challenge- Meet it
Life is a Puzzle – of due it
Life is a Gift – Accept it
आध्यात्मिक अभ्युदय के लिए चार हजार राजाओं के साथ अयोध्या नगर के सिद्धार्थ वन में अशोक वृक्ष के नीचे तेले की तपस्या में भगवान ने लुंचन किया। इन्द्र के आग्रह से एक मुष्दि लुंचन नहीं किया। 83 लाख पूर्व भगवान राज्य व्यवस्था परिवार में रहे। एक लाख पूर्व श्रामण्य का अनुपालन किया।
समत्व चेता भिक्षाचरी के लिए भ्रमण कराते। भिक्षा विधि से अनजान लोग हीरे, पन्ने, सोने के आभूषण, हाथी, घोड़ा, रथ, बग्धी, पालकी आदि की मनुहार करते पर आहारदान से सभी अनभिज्ञ थे। श्रेयांस ने सपने में देखा मैं सुमेरू पर्वत को अमृत से सिंचन कर रहा हुं। क्या है सुमेरू! क्या है अमृत! ऋषभ प्रभु को देखा श्रेयांस को जाति स्मृति ज्ञान हो गया। 12 माह और 10 दिन की तपस्या का पारण भगवान ऋषभ के प्रपौत्र श्रेयांस राजा सोमप्रभ का पुत्र के द्वारा हस्तिनापुर में इक्षुरस के द्वारा हुआ। आकाश से पंच दिव्यों की वर्षा हुई। अहोदानं का खर मुखर हुआ। वैशाख शुक्ला तृतीया का दिन अक्षय तृतीया के नाम से प्रसिद्ध हो गया। हजारों-हजारों नर-नारी ऋषभ के पदचिन्हों का अनुसार करते हुए प्रतिदिन उपवास नहीं कर सकते। पर एक दिन उपवास एक दिन पारण इस क्रम से वर्षीतप का पारण जैन तीर्थों में एवं आचार्यों के सान्निध्य में चारित्रात्माओं के पास करते है। वर्षीतप एक विशिष्ट परंपरा है। विभाव से स्वभाव की साधना है। आत्म कल्याण की आराधना है। अर्हम् अध्यात्म की उपासना है।
वर्षीतप जन-जन का तारणहारा है।
भवसागर से जीवन नैय्या का खैवनहारा है।
वर्षीतप करें मगर आडम्बर प्रदर्शन न करे।
सादगी संयम समता से आत्मरमण आत्मरंजन करे।