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आदिपुरुष : कला, कृषि और संस्कार के प्रथम गुरु
महापुरूषों का जन्म इतिहास का दस्तावेज बन जाता है। आचार्यश्री महाप्रज्ञजी का जन्म खुले आकाश में हुआ, ऊपर छत नहीं होने की वजह से आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी के हृदय में करूणा मैत्री उदारता एवं विशालता अत्यधिक थी। हम उससे आगे बढ़ते तो खुले आकाश में और भी महापुरूषों का जन्म हुआ होगा यह चिन्तन का विषय है। मैं आपका ध्यान बहुत अतीत में ले जाना चाहती हुं। सुषमा दुषमा नामक तीसरे आरे के 84 लाख पूर्व तीन वर्ष साढ़े आठ महीने अवशेष रहे। उस समय माता मरूदेवा ने एक युगल दान घरों का निर्माण नहीं था। प्रथम देवलोक में सौधर्मन्ड का आसन चलित हुआ। ज्ञान बल से देखा कुछ कम अठाराह करोड़ सैगर के बाद जम्बू दीप के दक्षिण भारत क्षेत्र में तीर्थकर बनने वाली आत्मा को अवतरण हो गया। छप्पन दिशा कुमरियों को निर्देश देते हुए कहा अविलम्ब सारी व्यवस्था करो। छप्पन दिशा कुमारियां माला मरुदेवां के पास आकर बोली आप हमारे से भयभीत न हो। एक विशाल सूतिका गृह की रचना कर एक योजना भूमि में संवर्तक वायु चलाकर कांटे पत्थर कचरे को दूर फेंका। मेघ की विकुर्वण के सुगन्धित जल की मंद-मंद वृष्टि कर धूलि को दबाया। पांच प्रकार के सुगन्धित पुष्पो की वर्ष कर पृथ्वी को सुशेभित किया। नाभिनाल को छेदन कर भूमि में गाड़ती हुइं इस गड़ढे को रत्नों से भर देती है। कंदली गृह का निर्माण कर देव विमान जैसा से चौक और सिंहासन की व्यवस्था की। एक देवी ने तीर्थकर होने वाले शिशु को हाथ में लिया। दूसरी चतुर देवी माता मरूदेवा का हाथ पकड़कर सुगन्धित वस्त्रों शरीर को पौंछा गौशीर्ष चन्दन का विलेपन कर दिव्य वस्त्राभूषण पहनाए।
सौंधमैन्ड ने अपने पांच रूप बनाकर शिशु को मेरूपर्वत के पण्डक वन में ले जाकर विधिवत जन्मोत्सव मनाया। तत्पश्चात् माला मरूदेवा के पास सुलाकर छत में एक स्वर्ण एवं रत्नमय श्रीदामगण्ड गेंद को लटकाया। एक लटकती हुई रत्नों को माला जिसे प्रतिपल शिशु निहाराता रहे। दाएं अंगूठे की नाड़ी अमृतमय रस का संक्रमण किया। जिसको चूसने मात्र से क्षुधा शान्त हो जलाए। पांच देवियों की धाय माता के रूप में लालन पालन के लिए नियुक्त किया। बारह योजन लम्बी नौ योजन चौड़ी अयोध्या नगरी का निर्माण हुआ। नामकरण में समय में प्रस्ताव आया तीर्थकरों की माता चौदह स्वप्न देखती, उसमें मरूदेवा ने प्रथम स्वप्न वृषभ का देखा तनदुरूप् बालक का वृवभ नाम रखा। कालान्तर में वृषभ के स्थान पर ऋषभ हो गया। जब शिशु का जन्म दिवस आया सौघमेन्द्र ने चिन्तन किया। प्रथम जिनेश्वर का जन्म हुआ। एक वर्ष बीत गया। किन्तु अभी तक वंश की स्थापना नहीं हुई। इन्द्र जन्मोत्सव के उपलक्ष्य पर उपहार स्वरूप अनेक पदार्थ थाल में लेकर आए। उस समय शिशु नाभि के गोद में थे। इन्द्र ने उपहार का थाल शिशु ऋषभ के सामने किया। शिशु ऋषभ ने थाल से गन्ने का पीस उठाया। इन्द्र ने उसी क्षण इच्छाकुवंश की स्थापना की। कुछ कम छ लाख पूर्व बीतने के वाद भरत का जन्म हुआ और समय कर्मभूमि में परिर्वर्तन हो गया। अनेक समस्याएं पनप रही थी। एक बार कुछ योगलियक ऋषभ के पास बैठे बाते कर रहे थे। हमारी समस्या का समाधना होगा वरना लड़ते लड़ते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाऐगे। ऋषभ ने कहा अब हमें राजा की जरूरत है, यौगोलिक बोले राजा कौन होता है। ऋषभ ने राजा के बारे में कुछ जानकारी दे दी। यौगोलिक बोले तब तो आप ही राजा बने। ऋषभ ने समझाया और कहा वर्तमान में हमारे नेता कुलकर नाभि है, उनके पास जाओ । राजा की मांग करो। भोले भाले यौगलिक नाभि के पास गए-आप अब हमे नये राजा नेता के रूप में दो। क्योकि कुलकर व्यवस्था अब निष्प्रभावी हो गई है। नाभि कुलकर ने कहा ऋषभ को ही राज बना दो, योगलिक मिलकर विनम्रता पूर्वक राज्यभिषेक करने लगे। अत्यधिक विनम्रता करने लगे यौगलिको की विनम्रता देख सौघमैन्द्र ने अयोध्या नगरी का दूसरा नाम विनिता नगरी रखा .त्रेसठ लाख पूर्व वर्ष राज्य का कुशल संचालन कर उसमें असि, मसि, कृषि तथा अनेक कलाओं का प्रशिक्षण तथा विद्या सिखा कर जब एक लाख वर्ष पूर्व जीवन अवशेष रहा उस समय चार हजार राजा आदि के संयम स्वीकार किया।
एक वर्ष चालीस दिन बाद प्रथम पारण हस्तिनापुर में प्रपौत्र श्रेयांस कुमार के हाथ से इक्षु रस से किया। अक्षय तृतीया तब से प्रारम्भ हुई। एक हजार वर्ष की ध्यान साधना के बाद कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। माता मरूदेवा ने महाप्रभु के अनुपम ठाठ बाट को देखा चिन्तन करते करते भावों की उत्कर्षता में माध्यम से सर्व प्रथम सिद्धालय में विराजमान हो गई। मातृऋण से भगवान उऋण बन गये। प्रवचन के बाद भरत के 500 पुत्र 700 पौत्रों ने दीक्षा स्वीकार की। ब्राह्मी प्रभु के चरणों में समर्पित होकर साधना करने लगी। बाद में 99वें पुत्र तथा सुन्दरी भी दीक्षित हो गई। भगवान ऋषभ का अधिकांश परिवार संयमपथ आरूढ होकर साधना करने लगे ।
प्रश्न होता है। मां स्वयं, पुत्र, पुत्रियां दीक्षा लेकर सिद्ध गति को प्राप्त हुए। फिर नभि कुलकर वर्तमान कहां है। एक शाश्वत नियम होता है। करोड़ पूर्व वर्ष की आत्मा उसी भव में मोक्ष जा सकते हैं। किन्तु एक से अधिक आयु वाला योगलिक उस भव में मोक्ष नहीं जा सकता। नाभि कुलकर अपना आयुष्य पूर्ण कर भवनपति देवों में नाग कुमार देव बने। दस हजार वर्ष की आयु स्थिति को भोग कर भगवान ऋषभ के युग में जन्म उतम कुल में लेकर संयम स्वीकार किया, संयम की उत्कृष्ट आराधना करते हुए सिद्धालय में विराजमान हुए।
धन्य है महाप्रभु ऋषभ् का परिवार माता पिता सौ पुत्र दोनों पुत्रियां अनेक प्रपौत्र आदि कर्मरज से निर्मल होकर लोक के अग्र भाग में सिद्ध भगवान के रूप प्रतिष्ठित हो गए। भगवान ऋषभ ने अपनी दीर्घ कालिक तपस्या का पारणा इक्षुरस से वैशाख शुक्ला तृतीया को किया। इस उपलक्ष में प्रतिवर्ष हजारों भाई बहिन तप के रूप में वर्षीतप के साधना करते हैं। तपस्या करने वालों के प्रति अनन्त अनन्त शुभकामना एवं अनुमोदना।