आदर्श के प्रतिमान थे ऋषभ देव

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डॉ. साध्वी सरलयशा

आदर्श के प्रतिमान थे ऋषभ देव

भौतिक और अध्यात्मिक उभय पथ को आलोकित करने वाले दिव्य पुरूष थे ऋषभ। उनसे जुडा़ हुआ अक्षय तृतीया का त्योहार मानव मात्र के लिए प्रेरणा प्रदीप है। खुशियों का जनक है। जैन जगत के लिए आत्मोत्थान का अपूर्व संदेश हैं। इस अवसर्पिणी काल के मानव को उन्होंने कर्मशीलता, कर्तव्यनिष्ठा का पाठ पढ़ाया। अध्यात्मिक जगत को आत्म् शुद्धि के सर्वोच्च ग्राफ को छूने का जज्बा दिया। उनके जीवन का हर एक पायदान अपने आप में प्रेरणा पुंज है। उनकी विराट्ता को उजागर करने वाले कुछेक मानक निम्न हैं-
संक्रमण काल में अवतरण :
भौगलिक युग की परिसंपन्नता के समय ऋषभ का जन्म माता मरूदेवा की कुक्षि से हुआ। जन्म के समय दिव्य ध्वनि के साथ चौसठ इन्द्र, छप्पन दिक्कुमारियों ने मेरू पर्वत पर बालक का जन्मोत्सव मनाया। वो माता भी पुण्यशालिनी थी। जिसने किसी विशेष तप त्याग, संयम अथवा विकट परिषह को झेले बगैर मुनिश्री का वरण किया। इस अवसर्पिणी काल में प्रथम सिद्धा बनकर नारी जाति के गौरव को प्रतिष्ठित किया। उसमें उनकी उत्कृष्ट सरलता ऋजुता ही सहकार रही होगी। विकास से ह्वास के पल कितने चुनौतिपूर्ण होते हैं। यह किसी भी मिल मालिक या बड़ा इन्वेस्टमेंट करने वाले व्यक्ति का अनुभव हो सकता है। कुमार ऋषभ प्राकृतिक संपदा के ह्वास काल में पैदा हुआ। अब तक प्राकृतिक संसाधनों से जीवन की अपेक्षाएं पूर्ण करने के आदि लोगों ने पहली बार प्राकृतिक ह्वास का मंजर देखा। परस्पर छिना झपटी जैसा माहौल होने लगा। ऋषभदेव ने पैदा होने वाली हर स्थिति को अपने दिव्यदृष्टि से समाहित किया। चुनौतियों का सामना किया। और आने वाली पीढ़ियों को चुनोतियों से न घबराने का संदेश संप्रेषित किया।
कुशल राजा :
तत्कालीन समाज में पैदा होने वाली समस्या को अपनी पैनी दृष्टि से आंका। जनता की संतुष्टि के लिए समुचित समाधान खोजा। इसी खोज में असि, मसि, कृषि का प्रवर्तन हुआ। आम जनता को सरस जीवन शैली से जौड़ा। उनके श्रम के संदेश में कवि की पंक्तियां उजागर हुई-
आलस्य में जिए और अमृत भी पीए,
तो जहर का पीना होता है।
जहां गिरता है मेहनत का पसीना,
वहां पत्थर भी नगीना होता है।।
जनता ने ऋषभ को अपना मुखिया स्वीकार किया। कुशल नेता के बतौर अपनी पहचान बनाई। कुशल नेता वो होता है जो प्रजा के सुख-दुख में शरीक होता है। उसकी परेशानी को दूर करता है। राज ऋषभ एक जनप्रिय नेता कहलाए।
परिवारिक दायित्व :
परिवार के सौहार्दपूर्ण वातावरण के सृजन में अभिभावको की अहं भूमिका हो सकती है। इसका बोधपाठ ऋषभ देव ने अपने आचरण से दिया। उनके सौ पुत्र और दो पुत्रियां थी। ज्ञान-विज्ञान, कला, कौशल की दृष्टि से सभी को निपुण बनाया। अपनी संपति को पुत्रों के बीच समान रूप् से बंटवारा कर उन्होंने परिवार समाज में समरसत, सौहार्द और समता का सूत्रपात किया। पक्षपात प्रिय अप्रियता की संकरी पगडंडियों से अपरत होकर समान वितरण का वर्तन कर अभिभावक वर्ग को परिवारिक सौहार्द का मंत्र दिया।
तिन्नाणं तारियाणं के राही :
गृहस्थ बंधनों से मुक्त होकर संयम की राहें पर संन्यासी बने। उनके साथ चार हजार राजा महाराजा आदि भी दीक्षित हुए। प्रभुजी मौनी बन गए। चूंकि तीर्थकर आत्मा केवल्य उपलब्धि पर्यंत सघन साधना में लीन रहती है।
प्रबल अन्तराय का उदय :
इसी जीवन में बंधे अन्तराय कर्मों का उदय हुआ। प्रभु बिना आहार पानी एक वर्ष तक आर्य और अनार्य क्षेत्रों में गोचरी की गवेषणा करते हुए घूमते रहे। अंतराय टूटी। विहरण के क्रम में हस्तिनापुर पधारे। पूर्व रात्रि में श्रेयांस ने मेरू पर्वत को हाथों से सिंचने का स्वप्न देखा था। राजमार्ग से ऋषभ प्रभु को जाते हुए जैसे ही प्रपौत्र श्रेयांस कुमार ने देखा उसे जाति स्मृति ज्ञान हुआ। उसके भीतर सपने को साकार करने का भाव जगा। कृषक द्वारा भेंट यें आए इक्षुरस ग्रहण करने की प्रभु को भावना भाई। प्रभु ने अपनी अंजुली मांडते हुए इक्षुरस ग्रहण किया। प्रभु का पारणा हुआ।
केवल्य का वरण :
संयम के मार्ग पर अन्तर्मुखी बनकर प्रभु आत्म शुद्धि का विराट बल पैदा करने कठोर साधना में लग गए। न किसी से कोई वार्तालाप में कोई निर्देश बस आत्मा की मस्ती चित्र की प्रशांत वाहिता में रमण करने लगे। कवि की पंक्तियां साकार बनी-
बहत्तर से बहत्तर की तलाश करो,
मिल जाए नदी तो सुमुद्र की तलाश करो।
टूट जाता है शीशा पत्थर की चोट से,
टूट जाए पत्थर उस शीशे के तलाश करो।।
आत्मा की गहराई में डुबकियां लगाते प्रभु ने संयम पर्याय के एक हजार वर्ष पश्चात केवल ज्ञान पाया। केवल्य के पारदर्शी शीशे में चराचर जगत के समस्त भाव प्रकट हो गए। प्रभु की साधना कालीन अप्रमत्तता हर एक संन्यास्त मुमुक्षु के लिए प्राणवान प्रेरणा है। चूकि प्रभु में एक हजार वर्ष के छद्मस्थ काल में विभिन्न टुकड़ियों को मिलाकर मात्र एक दिन-रात 24 घंटे की नींद ली थी। अक्षय तृतीया पर्व पर प्रभु का स्मरण हमारे भीतर अप्रमतता की चेतना को जगाने वाला बने। जिज्ञासु अपनी मंजिल की दूरी को पारकर अभिप्सित का वरण करें। प्रभु की साधना हमारी आराधना बने।