धर्म है उत्कृष्ट मंगल

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाश्रमण

धर्म है उत्कृष्ट मंगल

विक्रम संवत् १९५४। तेरापंथ के षष्ठ आचार्य श्री माणकगणी का सुजानगढ़ (चूरू) में चातुर्मासिक प्रवास। आचार्यवर का तनुरत्न ज्वरग्रस्त हो गया। औषधोपचार किया गया, परन्तु कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। बीदासर से यति केवलचंदजी आए। उन्होंने आचार्यश्री की आकृति और नाड़ी को देखकर बताया कि शरीर की स्थिति चिंतनीय है, अतः करणीय कार्य में अब विलम्ब नहीं होना चाहिए।
यतिजी के उस निर्णय को सुनते ही सन्त सहम गए। यद्यपि उस समय आचार्यदेव युवा-अवस्था में थे, फिर भी स्थिति की गम्भीरता को समझकर कुछ अनुभवी साधुओं ने चिन्तन किया कि भावी व्यवस्था की ओर गुरुदेव का ध्यान आकृष्ट करना आवश्यक है। मगन मुनि आदि कुछ सन्त गुरु-चरणों में पहुंचे, वंदना कर विनम्रता के स्वर में बोले-'प्रभो! आप शीघ्र स्वास्थ्य लाभ कर दीर्घकाल तक हमारा नेतृत्व करें-यही हमारी मनोकामना है! किन्तु गुरुदेव ! आपके स्वास्थ्य की दुर्बलता से हम सब चिंतित हैं। हमारा विनम्र निवेदन है कि आपको अब संघ का भावी प्रबन्ध कर देना चाहिए। युवाचार्य की प्रकट नियुक्ति का हमारा आग्रह नहीं है, आप भले उत्तराधिकारी का नाम पत्र में अंकित कर पूठे में रख लें।'
पूज्य श्री माणकगणी ने बातें को सुना पर मधुर उत्तर देकर उसे टाल दिया। इसका एक कारण यह था कि वे ज्योतिषी द्वारा लिखित अपनी जन्मकुण्डली की बातों पर विशेष विश्वास करते थे। उनमें से अनेक बातें पहले मिल चुकी थीं। इसलिए उन पर उनका विश्वास और भी दृढ़ हो गया था। जन्मकुण्डली के अनुसार उनका आयुष्य बासठ वर्ष का था। उस समय उनकी उम्र मात्र बयालीस वर्ष को थी। दूसरा कारण था कि ज्वर को उन्होंने साधारण ही समझा था। उन्हें कोई खतरा नहीं लग रहा था। इसलिए उनकी दृष्टि में वह भावी प्रबन्ध का उचित अवसर नहीं था।
आखिर वही हुआ जो होना था। कार्तिक कृष्णा तृतीया की रात्रि आई। घड़ी ग्यारह बजने की सूचना दे रही थी। पूज्यवर ने इस जीवन का अन्तिम श्वास ले लिया। उस समय आचार्यश्री का असामयिक वियोग जितना वेदनाकारक नहीं था, उतना वेदनाकारक संघ का संघपतिविहीन होना था। उद्यान के लिए माली की कितनी आवश्यकता हैं वैसे ही संघ के लिए संघपति की कितनी आवश्यकता। गणपतिविहीन गण में विघटन की घटना घट सकती है परन्तु मुझे गौरव है भैक्षव शासन के उन मुनिवरों पर जिन्होंने उस संकट के समय सूझ-बूझ से काम किया, संघनिष्ठा का परिचय दिया और संघहित के लिए निजी हितों को गौण किया।
सुजानगढ़ में उस समय चौदह साधु थे। चतुर्मास का लगभग एक महीना अवशेष था। साधुओं ने मिलकर विचार-विमर्श किया और निर्णय लिया कि भावी आचार्य के बारे में अभी कोई चिन्तन नहीं किया जाएगा। चतुर्मास के बाद सारा संघ एकत्रित होगा तभी इस प्रश्न को हल किया जाएगा। आचार्य के अभाव को स्थिति में तात्कालिक व्यवस्था की गई। तपस्वी भीमजी स्वामी को, जो कि वहां सब सन्तों में दीक्षा-वृद्ध थे, अग्रगण्य नियुक्त किया गया, 'आज्ञा आलोयणा' के लिए उनको अधिकृत किया गया। साथ ही साथ यह भी निश्चय हुआ कि चतुर्मास के पश्चात् ज्यों-ज्यों साधु एकत्रित होंगे, उनमें जो भी दीक्षा-वृद्ध होगा, उसी को अग्रगण्य समझा जाएगा। (दीक्षा वृद्ध का तात्पर्य संभवतः दीक्षावृद्ध अग्रणी मुनि है।)
चतुर्मास की समाप्ति के बाद तत्रस्थ श्रमणसंघ वहां से विहार कर लाडनूं आ गया। अन्य स्थानों से भी संत-सतियों के सिंघाड़े वहां आने लगे। मृगशिर महीने में प्रायः साधु-साध्वियां पहुंच गए। परन्तु संघ के महान् हितैषी, अनुभवी, विचारक, प्रभावशाली और आचार्यों द्वारा विशेष सम्मानित मुनि श्री कालूजी स्वामी (बड़े) अभी तक नहीं पहुंचे थे। उनकी प्रतीक्षा की जा रही थी। उनके आने की देरी ही भावी आचार्य के मनोनयन को देरी थी। पौष कृष्णा तृतीया को वे लाडनूं पहुंचे। उनके पहुंचते ही सारे संघ में उत्सुकता की एक लहर दौड़ गई। उन्होंने आते ही उसी दिन साधु-साध्वियों से बातचीत की। उदीयमान युवा संत मगन मुनि और कालू मुनि से विचार-विमर्श किया। जन-साधारण की भी भावना को समझा। वहां के वातावरण का अध्ययन करने के पश्चात् एकमात्र संघहित को दृष्टिगत रखकर उन्होंने गम्भीर चिन्तन किया। सायंकालीन प्रतिक्रमण के पश्चात् सब साधुओं की सभा आयोजित की गई। प्रारम्भ में शिष्टाचार की बातें चलीं। फिर मूल प्रश्न को सम्मुख लिया गया। कालूजी स्वामी ने साधुओं से कहा-सन्तों! में आप से संघपति की भिक्षा मांगता हूं। आप मुझे संघपति दें। सन्तों ने एक स्वर में कहा-हम तो आप से संघपति की मांग कर रहे हैं। यों कालूजी स्वामी और संतों के बीच मधुर मनुहारें होने लगीं। वहां का वातावरण प्रसन्न और सुखद बन गया। सबने मुनि कालूजी को आचार्य के चयन का भार सौंप दिया।
मुनिश्री ने उस अनुकूल वातावरण का समुचित लाभ उठाया। गम्भीर चिन्तन उनका पहले ही किया हुआ था। उन्होंने संघ, स्वामीजी तथा अन्य आचार्यो का गुणगान करते हुए कहा- 'हमारा शासन भगवान महावीर का शासन है। उसका संचालन करने के लिए आज हमें एक आचार्य की आवश्यकता है। भावी आचार्य के नाम को उद्घोषणा करने के लिए आप सबने मुझे जो यह भार दिया है, मैं उसके लिए अपना सौभाग्य मानता हूं। आप सबकी अनुमति का उपयोग करते हुए में संघ के सप्तम आचार्य के पद पर मुनिश्री डालचंदजी का नाम घोषित करता हूं।' इस घोषणा के साथ ही हर्ष ध्वनि हुई। सबने सनाथता का अनुभव किया।