स्वाध्याय
श्रमण महावीर
'भंते! मैं पिछले जन्म में हाथी था? मेघ ने जिज्ञासा की।'
भगवान ने बताया- 'मेघ, तुम अतीत की दिशा में प्रयाण करो और देखो। इससे तीसरे जन्म में तुम हाथी थे- विशाल और सुन्दर। तुम वैताढ्य पर्वत की उपत्यका के वन में रहते थे। ग्रीष्म ऋतु का समय था। वृक्षों के संघर्षण से आग उठी। तेज हवा का सहारा पा वह प्रदीप्त हो गई। देखते-देखते पोले पेड़ गिरने लगे। वनांत प्रज्वलित हो उठा। दिशाएं धूमिल हो गईं। चारों ओर अरण्य पशु दौड़ने लगे। उस समय तुम भी अपने यूथ के साथ दौड़े। तुम्हारा यूथ आगे निकल गया। तुम बूढ़े थे, इसलिए पिछड़ गए। दिशामूढ हो दूसरी दिशा में चले गए। तुमने एक सरोवर देखा। पानी पीने के लिए उसमें उतरे। उसमें पानी कम था, पंक अधिक। तुम तीर से आगे चले गए, पानी तक पहुंचे नहीं, बीच में ही पंक में फंस गए। तुमने पानी पीने के लिए सूंड को फैलाया। वह पानी तक नहीं पहुंच सकी। तुमने पंक से निकलने का तीव्र प्रयत्न किया। तुम निकले नहीं, और अधिक फंस गए। उस समय एक युवा हाथी वहां आया। वह तुम्हारे यूथ का था। तुमने उसे दंत-प्रहार से व्यथित कर यूथ से निकाला था। तुम्हें देखते ही उसमें क्रोध का उफान आ गया। वह तुम्हें दंत-प्रहार से घायल कर चला गया। तुम एक सप्ताह तक कष्ट से कराहते रहे। वहां से मरकर तुमने गंगा नदी के दक्षिणी कूल पर विन्ध्य पर्वत की तलहटी में फिर हाथी का जन्म लिया वनचरों ने तुम्हारा नाम रखा मेरुप्रभ।
'एक बार वन में अकस्मात् दावानल भड़क उठा। तुम अपने यूथ के साथ वन से भाग गए। दावानल ने तुम्हारे मन में विचित्र-सा कंपन पैदा कर दिया। तुम उस गहरे आघात की स्थिति में स्मृति की गहराई में उतर गए। तुम्हें वह दावानल अनुभव किया हुआ-सा लगा। तुम अनुभव की यात्रा पर निकल गए। आखिर पहुंच गए। पूर्वजन्म की स्मृति हो गई। वैताढ्य के वन का दावानल आँखों के सामने साकार हो गया।
'तुमने अतीत की स्मृति का लाभ उठा एक मंडल बनाया। उसे सर्वथा वनस्पति-विहीन कर दिया। एक बार फिर दावाग्नि से वन जल उठा। पशु पलायन कर उस मंडल में एकत्र होने लगे। तुम भी अपने यूथ के साथ उस मंडल में आ गये। देखते-देखते वह मंडल पशुओं से भर गया। अग्नि के भय से संत्रस्त होकर वे सब वैर-विरोध को भूल गए। समूचा मंडल मैत्री-शिविर जैसा हो गया। उसमें सिंह, हिरण, लोमड़ी और खरगोश सब एक साथ थे। उसमें पैर रखने को भी स्थान खाली नहीं रहा।
'तुमने खुजलाने को पैर ऊंचा उठाया। उसे नीचे रखते समय पैर के स्थान पर खरगोश को बैठे देखा। तुम्हारे मन में अनुकम्पा की लहर उठी। तुमने अपना पैर बीच में ही रोक लिया। उस अनुकम्पा से तुमने मनुष्य होने की योग्यता अर्जित कर ली।
'दो दिन-रात पूरे बीत गए। तीसरे दिन दावानल शांत हुआ। पशु उस मंडल से बाहर निकल जंगल में जाने लगे। वह खरगोश भी चला गया। तुम्हारा पैर अभी अन्तराल में लटक रहा था। तुमने उसे धरती पर रखना चाहा। तुम तीन दिन से भूखे और प्यासे थे। बूढ़े भी हो चले थे। पैर अकड़ गया था। जैसे ही पैर को नीचे रखने का प्रयत्न किया, तुम लुढ़क कर गिर पड़े, मानो बिजली के आघात से रजतगिरि का शिखर लुढ़क पड़ा हो। तीन दिन-रात तुम घोर वेदना को झेलते रहे। वहां से मरकर तुम श्रेणिक के पुत्र और धारिणी देवी के आत्मज बने।
'मेघ! जब तुम तिर्यञ्च योनि में थे, सम्यग्दर्शन तुम्हें प्राप्त नहीं था। तब तुमने खरगोश की अनुकम्पा के लिए ढाई दिन तक पैर को अन्तराल में उठाए रखा। उस कष्ट को कष्ट नहीं माना। तुम्हारा कष्ट अहिंसा के प्रवाह में बह गया। अब तुम मनुष्य हो, सम्यग्दर्शन तुम्हें प्राप्त है, ज्योतिशिखा तुम्हारे हाथ में है, फिर अमा की अंधियारी ने कैसे तुम्हारी आँखों पर अधिकार कर लिया? कैसे तुम थोड़े से कष्ट से अधीर हो गए? श्रमणों का चरण स्पर्श कैसे तुम्हें असह्य हो गया? उनकी किंचित् उपेक्षा कैसे तुम्हारे लिए सिरशूल बन गई?'
मेघकुमार की स्मृति पर भगवान् ने इतना गहरा आघात किया कि उसकी स्मृति का द्वार खुल गया। अतीत के गहरे में उतरकर उसने पंक में खड़े हाथी को देखा और दर्शन की श्रृंखला में यह भी देखा कि श्वेतहस्ती पैर को अधर में लटकाए खड़ा है। वह स्तब्ध रह गया। उसका मानस-तंत्र मौन, वाणी-तंत्र अवाक् और शरीर-तंत्र निश्चेष्ट हो गया। वह प्रस्तर--प्रतिमा की भांति स्थिर-शांत खड़ा रहा। दो क्षण तक सारा वातावरण नीरवता से भर गया। सब दिशाएं मौन के अतल में डूब गई। सब कुछ शांत, प्रशांत और उपशांत।