-आचार्यश्री महाप्रज्ञ

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाप्रज्ञ

-आचार्यश्री महाप्रज्ञ

ध्यान और मुनि
साधक इस संकल्प साधना पथ पर अग्रसर होता है–
'अमग्गं परियाणामि, मग्गं उवसंपज्जामि।
अन्नाणं परियाणामि, नाणं उपसंपज्जामि।
अबंभं परियाणामि, बंभं उपसंपज्जामि।'
मैं साधना के प्रतिकूल मार्ग को छोड़ता हूं और सम्यक् मार्ग की संपदा स्वीकार करता हूं। मैं अज्ञान से विरत होता हूं और सम्यक् ज्ञान की आराधना में प्रस्तुत होता हूं। मैं बहिर्भाव को त्यागता हूं और स्वभाव की साधना में प्रवृत्त होता हूं।
इन संकल्पों की सतत स्मृति और तदनुरूप प्रवर्तन ही ध्यान की सिद्धि में उपादेय है। जब साधक स्वभाव से मुंहमोड़, पुनः परभाव की ओर उन्मुख हो जाता है, तब ध्यान का अंकुर मुरझा जाता है, सूख जाता है और जल जाता है। इसके साथ उसकी समस्त वृत्तियां लक्ष्य से विमुख हो जाती हैं। आचार्य शुभचंद्र ने उन्हें आड़े हाथों लिया है। वे कहते हैं- 'वह यति-मुनि कैसे ध्यान-सोपान पर आरूद हो सकता है जिसके जो कर्म में है, वह वचन में नहीं है और जो वचन में है, वह मन में नहीं है। जिसकी कथनी, करनी और चिंतन में एकरूपता नहीं है।' 'जो बाह्य परिग्रह को छोड़कर भी विविध परिग्रह में जुड़े रहते हैं, संयम में अधीर हैं तथा कीर्ति, पूजा और अहंकार में आसक्त हैं, लोकरंजन में कुशल हैं, सद्ज्ञानचक्षु विलुप्त हो गया है वे कैसे ध्यान में योग्य हो सकते हैं।' इसके साथ-साथ जो यह कहते हैं कि यह दुःषम-काल है। इस समय ध्यान की योग्यता कहां है? वे ध्यान का अपकर्ष करते हैं। जो भोग से विरत, ज्ञानशून्य चित्तवाले, तथा करुणार्द्रहृदय नहीं हैं, वे ध्यान में सक्षम नहीं हो सकते। वे ही साधक अपने ध्यान की प्राप्ति में सफल होते हैं जो अपने लक्ष्य, निष्ठा और मुमुक्षावृत्ति से विमुख नहीं होते तथा उसे विस्मृत नहीं करते।
पातञ्जल योगदर्शन में धारणा और समाधि को अलग स्थान दिया है। जैन परम्परा में वे दोनों ध्यान के अंतर्गत हैं। धारणा ध्यान का प्राथमिक चरण है और समाधि अंतिम। ध्यान मध्य में है। ध्यान का ही प्रकृष्ट रूप समाधि है। ध्यान को समझ लेने पर यह अविज्ञात नहीं रहेगा। चित्त को किसी एक स्थान पर केन्द्रित करना धारणा है। उसी में लंबे समय तक टिका रहना ध्यान है और समाधि है, अपने स्वरूप के सिवाय किसी अन्य का आभास नहीं होना। जैनाचार्यों ने ध्यान के संबंध में कहा है- 'एकाग्रचिन्तायोगनिरोधो वा ध्यानम्'- किसी एक ही विषय का चिंतन, एक विषय पर स्थिरीकरण और योग (काय, वाणी तथा मन के समस्त व्यापारों) का निरोध करना ध्यान है। समग्र प्रवृत्तियों का सर्वथा निरोध ध्यान का उत्कृष्टतम रूप है। वहां शुद्ध चैतन्य - अस्तित्व के अतिरिक्त और कुछ नहीं रहता। सीधा इसमें प्रवेश सर्वसाधारण के लिए असहज है। ध्येय यही है। किन्तु यहां तक पहुंचने के लिए मन को पहले धारणा एकाग्रचिंतन के द्वारा तदनुरूप बनाना आवश्यक है। धारणा ध्यान की सहयोगिनी है। इसे सालम्बन या व्यावहारिक ध्यान कहा जा सकता है। निरावलंबन ध्यान पारमार्थिक है। जिसमें ध्येय परमात्मा रहता है। आचार्य जिनभद्र के अनुसार स्थिर चेतना ध्यान और जल चेतना चित्त कहलाता है-
'जं थिरमज्झवसाण तं झाणं, जं चलं तयं चित्तं ।'
आचार्य रामसेन के विचार से एक आलंबन पर अंतःकरण की वृत्ति का निरोध ध्यान है। उसी प्रकार चिंतन रहित केवल स्व-संवेदन भी ध्यान है-
'अभावो वा निरोधः स्यात्, स च चित्तान्तरव्ययः ।
एकश्चिन्तात्मको यद् वा, स्वसंविच्चिन्ततोज्झिता ।।'
आचार्य महाप्रज्ञजी ने लिखा है- 'जैन आचार्य ध्यान को अभावात्मक नहीं मानते। इसके लिए किसी न किसी एक पर्याय का आलंबन आवश्यक है। स्व-संवदेन ध्यान को निरालंबन ध्यान कहा जाता है किंतु यह सापेक्ष शब्द है। इसमें किसी श्रुत के पर्याय का आलम्बन नहीं होता-इस दृष्टि से यह निरालंबन है। निरालंबन ध्यान में ध्याता और ध्येय भिन्न नहीं होते। उसमें शुद्ध चेतना का ही उपयोग होता है। सालंबन ध्यान में ध्येय और ध्याता का भेद होता है। जैन साधकों का यह अनुभव है कि प्रारंभ में सालंबन ध्यान करना चाहिए।