अक्षय तृतीया (आखा तीज)

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प्रदीप छाजेड़, बोरावड़

अक्षय तृतीया (आखा तीज)

भगवान ऋषभ के समय काल में परिवर्तन के साथ व्यवस्थाओं में भी बदलाव आया था। श्रम करो,शांति से जीओ आदि का नारा पा अनेक नोजवानों आदि - आदि ने हाथ आगे बढ़ाया था। उस समय कल्पवृक्ष ने फल देना बंद कर दिया था तब भगवान् ऋषभ ने लोगो को कृषि कर्म करना सिखाया था। खेतों में अनाज बोने से हर चीज़ उत्पन्न होगी आदि- आदि हर कार्य विधि बहुत सावधानी से उन्होंने बताया था। परन्तु लोगों के बौद्धिक विकास के अभाव में जितना उनको बताया जाता था उतना ही वे समझ पाते थे उससे आगे करने की उनकी विवेक समझ लोगों में नहीं थी। बैलों को घुमाकर अनाज निकालने की विधि में भूखे बैल ही अनाज सारा खा जाते थे।
यह देखकर तब चिंतित यौगलिक मिलकर भगवान् ऋषभ के पास आएं तो उनको भगवान् ऋषभ ने घास की रस्सियों की छींकी बैलों को कैसे लगाए वो समझा दी। एक दाना भी फालतू नही गया यह सोच किसानों के चेहरे मुस्कुरा गयें। परन्तु भूखें बैलों के सामने चारा रखा वो नहीं खा पाने से लोग बहुत विकुलाये।यह सोच लोग वापस भगवान् ऋषभ के पास गये और बोले की ऐसे तो भूख से बैल मर जायेंगे।
यह इतने व्याकुल हृदय होकर उन्होंने अपनी बात भगवान् ऋषभ को बतायी। बैलों के छींकी खोलने की बात से वह बिल्कुल अनजान थे। वह किसान भगवान् ऋषभ से सही से समाधान पा हर्षविभोर हो गये। असि, मसि,कृषि कर्म सिखाने के साथ दंड, सेवा,वर्ण,ग्राम व्यवस्था आदि-आदि का दायित्व भी भगवान् ने बखूबी निभाया। वह तत्काल भगवान् ऋषभ के पास जाकर उनके चरणों मे विधिवत वंदन कर प्रासुक आहार की श्रेयांश कुमार ने भावना भाईं।
वह शुद्ध आहार में इक्षु रस के एक सौ आठ घड़े भरे होने की बात भगवान् को उन्होंने बताई। राजकुमार श्रेयांश ने उल्लसित भावना से इक्षुरस का दान दिया था। भगवान् ऋषभ ने भी दोनों हथेलियों को सटाकर मुख से इक्षुरस को लगा लिया था। अपने पूर्व में बंधे अंतराय कर्मों के उदय का विपाक इस तरह से सामने में आया था। वह अनजाने में बारह घंटे बंधी छींकी का परिपाक आज ही के दिन भगवान् ने पाया था। स्वयंसिद्ध मुहूर्त्त आखा तीज, वैशाख मास शुक्ल पक्षधारी, इक्षु रस पान से वर्षीतप पारणा करने की यह विधि आदिनाथ प्रभु के भव से शुरू हुई।
आज का पावन पर्व हमें अंतराय कर्म से बचने की शिक्षा देता है।आदिनाथ भगवान ने बिना किसी रागद्वेष के भाव से सिर्फ जब बैल सारा अनाज खा लेते थे तो किसानों के निवेदन पर भगवान ने सिर्फ बैलों को छिंकी बांधने की बात कही थी। 12 घण्टों तक यह छिंकी बंधे रहने से बैलों को जो कष्ट हुआ उसके परिणामस्वरूप भगवान् को कई गुणा मल्टीप्लाई होकर 13 महीने 9 दिन तक कोई आहार पानी नहीं मिला। उसके बाद दसवें दिन अपने प्रपौत्र
को जातिस्मृति ज्ञान होने पर ही गोचरीविधि की जानकारी होने से पारणा भगवान् का हुआ।
हम सब सचेत होकर किसी भी जीव को अंतराय देने से बचने की अपने विवेक से प्रतिज्ञा लेकर कर्मों से हल्के होते हुए कर्म मुक्त होने की तरफ आगे बढ़े।सभी के प्रति यहीं मंगलभाव।